मामूली नहीं थे, हवाई जहाज़ से यात्राएं करते थे गांधी के हत्यारे!

गांधी की हत्या, निश्चित ही किसी एक व्यक्ति की कुंठा या उत्तेजना का परिणाम नहीं थी. यह एक सुनियोजित षड्यंत्र था, जिसको भरपूर आर्थिक मदद मिल रही थी. गांधी के हत्यारे बंबई (अब मुंबई) और दिल्ली में होटलों में रह रहे थे. वे न केवल ट्रेन से यात्रा कर रहे थे, बल्कि हवाई जहाज़ से भी दिल्ली-बंबई आ-जा रहे थे.

- इन्द्रेश मैखुरी



आज जब महात्मा गांधी की पैदाइश के 150 साल पूरे हो रहे हैं, तब लगता है कि एक चक्र पूरा हो कर दुष्चक्र की ओर बढ़ गया है. गांधी के महात्मा घोषित होने से शुरू हुआ सिलसिला गांधी के हत्यारों के स्तुतिगान तक आ पहुंचा है. उन हत्यारों को वीर योद्धा ठहराने, उन्हें महिमामंडित करने और गांधी को लांछित करने का अभियान आजकल इस देश में खूब तेजी से पनप रहा है.


पर क्या गांधी के हत्यारे, वास्तव में वैसे ही वीर थे, जैसा कि उनके विचार के वाहक देश को समझाना चाहते हैं? क्या वे वास्तव में कोई मुक्तिदाता थे? गांधी के हत्यारों के असली चेहरे समझने में जो साहित्य मददगार है, उसमें जी.डी.खोसला की एक छोटी पुस्तिका भी है. इस पुस्तिका का नाम है – द मर्डर ऑफ द महात्मा यानि महात्मा की हत्या.


जी.डी.खोसला पंजाब उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहे. वे उस तीन सदस्यीय खंडपीठ में बतौर न्यायाधीश मौजूद थे, जिस खंडपीठ ने सेशन कोर्ट द्वारा सज़ा हो जाने के पश्चात गांधी के हत्यारों की अपील सुनी थी. खोसला की उक्त पुस्तक, शिमला में गांधी के हत्यारों के अपील की सुनवाई और फांसी चढ़ने के साथ-साथ इस बात का भी विवरण देती है कि हत्यारों ने गांधी की हत्या का षड्यंत्र कैसे रचा और उसे कैसे अंजाम दिया.


गांधी के हत्यारों, खासतौर पर नाथूराम गोडसे ने अदालत में यह साबित करने की भरसक कोशिश की कि इस हत्या के पीछे कोई षड्यंत्र नहीं था. सेशन कोर्ट से सज़ा हो जाने के पश्चात हाई कोर्ट में हत्या को नकारने के लिए नहीं बल्कि षड्यंत्र की बात नकारने के लिए ही अपील की गयी.


लेकिन खोसला के सिलसिलेवार विवरण से स्पष्ट होता है कि गांधी की हत्या, निश्चित ही किसी एक व्यक्ति की कुंठा या उत्तेजना का परिणाम नहीं थी. यह एक सुनियोजित षड्यंत्र था, जिसको भरपूर आर्थिक मदद मिल रही थी. गांधी के हत्यारे बंबई(अब मुंबई) और दिल्ली में होटलों में रह रहे थे, वे न केवल ट्रेन से यात्रा कर रहे थे, बल्कि हवाई जहाज़ से भी दिल्ली-बंबई आ-जा रहे थे.


आज से 70 साल पहले हवाई जहाज़ का सफ़र कोई मामूली खेल नहीं रहा होगा. बड़े रईसों के लिए यह मुमकिन था. और इधर हत्यारों का एक गिरोह था, जो गांधी की हत्या करने के लिए बंबई से दिल्ली हवाई जहाज़ में आ रहा था !


गांधी की हत्या करने के लिए निकलने से पहले 13-14 जनवरी 1948 को नाथूराम ने अपनी दो जीवन बीमा पॉलिसियों का लाभार्थी अपने सह अभियुक्त नारायण आप्टे और अपने भाई गोपाल गोडसे की पत्नियों को बनाया. और कितने की थी ये जीवन बीमा पॉलिसियां? एक 2000 रुपये की और दूसरी 3000 रुपये की यानि कुल 5000 रुपये.उस वक्त 5000 रुपये अच्छी-ख़ासी रकम थी.


नाथूराम कोई धन्नासेठ नहीं था, ना ही वह किसी अमीर खानदान से था. बल्कि 6 भाई-बहनों वाले परिवार में वह दूसरे नंबर पर था और उसके पिता गाँव के एक मामूली पोस्टमास्टर थे. उसने बिना मैट्रिक पास किए स्कूल छोड़ दिया था. उसने कपड़े का छोटा-मोटा कारोबार शुरू किया पर वह चल न सका. फिर वह टेलरिंग के कारोबार में शामिल हो गया पर वहाँ भी सफल न हुआ.


उसके बाद वह आरएसएस और हिन्दू महासभा में शामिल हो गया. इस तरह देखें तो कारोबारी रूप से नाथूराम एक विफल व्यक्ति था. लेकिन उसके पास हजारों रुपए की बीमा पॉलिसियाँ थीं और वह दूसरी बार में हवाई जहाज़ से गांधी को मारने बंबई से दिल्ली आया था. तो निश्चित ही कोई न कोई था, जो उसके और हत्या में शामिल अन्य लोगों का वित्त पोषण कर रहा था.