रोहिंग्याओं का संकट पूरी दुनिया का संकट है

बांग्लादेश में अब तक 18,863 संक्रमण दर्ज किए गए हैं और 283 लोगों की मौत हुई है. रोहिंग्याओं की घनी आबादी के बीच अगर संक्रमण फ़ैला तो अनुमान लगाया जा रहा है कि यह भयानक तबाही ला सकता है. सवाल यह भी है कि अगर रोहिंग्या शरणार्थी कैंप या दुनिया भर में कोई भी असहाय तबका कोरोना का भीषण प्रकोप झेलता है तो क्या दुनिया सुरक्षित रहेगी?

- अभिनव श्रीवास्तव

दुनिया के सबसे बड़े और बांग्लादेश के बेहद घने रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में कोरोनावायरस का पहला मामला सामने आया है और इस बात की पुष्टि बांग्लादेश के एक वरिष्ठ अधिकारी और संयुक्त राष्ट्र के एक प्रवक्ता ने कर दी है. ग़ौर करने वाली बात है कि बीते कई महीनों से जानकार इन शिविरों में कोरोना वायरस फ़ैलने के संभावित नतीजों के बारे में सतर्क कर रहे थे और अब संक्रमण का पहला मामला सामने आने के बाद चिंताएं बढ़ गई हैं. ख़बरों के अनुसार, कुछ आपातकालीन टीमें संक्रमण की जगह पर भेज दी गई हैं और साथ ही एक 5000 लोगों वाले शरणार्थी शिविर के एक ब्लॉक को पूरी तरह आवाजाही के लिए बंद कर दिया गया गया. दक्षिणी बांग्लादेश के जिस कॉक्स बाज़ार इलाक़े में यह मामला सामने आया है, वहां भयानक गरीबी के ​बीच म्यांमार से पलायन कर आए 10 लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों को बेहद घने शिविरों में बसाया गया है। अप्रैल महीने की शुरुआत में यहां कोरोना संक्रमण के कई मामले सामने आने के बाद पूरी तरह कर्फ़्यू लगा दिया गया था। ऐसे में कोरोनावायरस से बचने के लिए दैहिक दूरी बनाए रखना यहां बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। ग़ौरतलब है कि कोरोना संक्रमण के बढ़ने के बाद बीते दिनों रोहिंग्या मुसलमानों के कई जत्थों के बंगाल की खाड़ी में फंसे होने और दक्षिणी बांग्लादेश के समुद्र तटों पर उतरने की ख़बरें आती रही हैं। बांग्लादेश के सुरक्षा अधिकारी ने बीते दिनों यह बताया था कि लगभग चालीस लोगों को लेकर एक नाव देश के दक्षिणी किनारे पर आई जिसमें अधिकतर भूखे बच्चे और महिलाएं शामिल थीं। ठीक इसी तरह कुछ दिनों पहले म्‍यामांर से मलेशिया जा रहे 32 रोहिंग्‍या मुसलमानों की समुद्र में भूख से तड़प-तड़पकर मौत होने की ख़बर भी सुर्ख़ियों में थी। दरअसल साल 2017 में म्यांमार के रख़ाइन प्रांत में बड़े पैमाने पर रोहिंग्या मुसलमानों पर हिंसक और संगठित हमले हुए जिसके बाद लगभग 7,50,000 से भी ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार छोड़कर बांग्लादेश की सीमा पर चले गए थे। तब म्यांमार की स्टेट काउंसलर और नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सन सू ची की अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उनकी चुप्पी के लिए आलोचना की थी। मानवाधिकारों की पैरोकार के रूप में आंग सन सू ची की विश्वसनीयता पिछले साल दिसम्बर में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में म्यांमार की सेना पर लगाए गए सामूहिक जनसंहार के आरोपों का बचाव करने के कारण और संदिग्ध हो गई थी। तब उन्होंने कहा था: "क्या किसी ऐसे राज्य का मक़सद जनसंहार करना हो सकता है जो कि सक्रिय तौर पर अपने उन सैनिकों और ​अधिकारियों की जांच करता हो उन पर मुक़दमे चलाता हो और जो ग़लत करने के दोषी पाए जाएं उन्हें दंड देता हो? रख़ाइन क्षेत्र आज, बौद्ध अराकन सेना और म्यामार की सेनाओं के बीच एक अंदरूनी हथियारबंद संघर्ष से जूझ रहा है. मुसलमान इस संघर्ष में कोई पार्टी नहीं हैं, लेकिन हो सकता है कि संघर्ष क्षेत्र के दूसरे नागरिकों की तरह ही ये लोग भी, अपनाए जा रहे सुरक्षा उपायों से प्रभावित हो रहे हों. हम अदालत से गुजारिश करते हैं ऐसी कोई भी कार्रवाई ना करे जो कि रख़ाइन इलाक़े में चल रहे सशस्त्र संघर्ष को और ​भड़का दे और शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरा बन जाए.'' कोरोना महामारी के बीच बांग्लादेश में शरणार्थी शिविरों में पहले से रह रहे और दक्षिणी तट पर उतरने की कोशिश कर रहे रोहिंग्या समुदाय की स्थिति को बांग्लादेश सरकार के रवैए ने भी चिंताजनक बना दिया है। कुछ दिन पहले बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमेन ने किसी भी रोहिंग्या को बांग्लादेश में शरण नहीं देने की बात कही थी। वहीं अब बांग्लादेश सरकार ने रोहिंग्या शिविरों में इंटरनेट और दूरसंचार सेवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस कदम पर तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सवाल उठा रही हैं। उनका मानना है कि संकट के इस समय सूचनाओं तक सही पहुंच बहुत आवश्यक है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के बांग्लादेश प्रतिनिधि साद हमीदी ने यह बात रेखांकित करते हुए कहा: "इंटरनेट सेवाओं या दूरसंचार सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने का यह सही समय नहीं है. क्योंकि यही असल में जानकारियों को तेज़ी से लोगों तक पहुंचाने का सबसे आसान ज़रिया हैं. इसलिए इन सुविधाओं को इन असहाय लोगों तक पहुंचाना चाहिए." इसके उलट बांग्लादेश रिफ्यूजी रिलीफ़ के प्रमुख शम्सु डोअजा ने दावा किया कि इस समय सरकार सभी आवश्यक चीजें मुहैया कराने में ध्यान दे रही है। उनके अनुसार: ''हमने उन सारी ही जगहों को बंद कर दिया है जहां लोग अक्सर जुटते हैं. स्कूल, मदरसे, लर्निंग सेंटर्स जैसी सारी जगहें. जो ज़रूरी सुविधाएं हैं वो ही चालू रहेंगी.'' जाहिर है कि ऐसे हालातों में बांग्लादेश में शरणार्थी शिविरों में पहले ही मुश्किलों से गुज़र-बसर कर रहे रोहिंग्या समुदाय की स्थिति और ख़राब होने वाली है। मानवाधिकार समूह अपील कर रहे हैं कि ऐसी ​व्यवस्थाएं कराई जाएं जिससे ये शरणार्थी दैहिक दूरी के एहतियात का पालन कर सकें. बांग्लादेश में अब तक 18,863 संक्रमण दर्ज किए गए हैं और 283 लोगों की मौत हुई है. रोहिंग्याओं की घनी आबादी के बीच अगर संक्रमण फ़ैला तो अनुमान लगाया जा रहा है कि यह भयानक तबाही ला सकता है. सवाल यह भी है कि अगर रोहिंग्या शरणार्थी कैंप या दुनिया भर में कोई भी असहाय तबका कोरोना का भीषण प्रकोप झेलता है तो क्या दुनिया सुरक्षित रहेगी? संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुतरेश पहले ही यह कह चुके हैं कि उन लोगों को मदद करना जिन्हें ज़रूरत है, यह एहसान नहीं है बल्कि ख़ुद को मदद करना है.