रास्ता वही है, चलने वाले ही ठहर गए

अल्मोड़ा विमर्श का हासिल यह है कि सभी लोगों में तड़प है और उन्हें साझा मंच की आवश्यकता समझ में आती है. लेकिन यह अपनी-अपनी निजी पहचान को गलाकर समर्पित हुए बिना व्यावहारिक रूप शायद नहीं लेगा. इसके लिए लोग कितने तैयार होंगे? युवाओं को अधिक से अधिक जोड़ने और जनता के बीच जाने का चुनौतीपूर्ण काम कैसे होगा? बहरहाल, आने वाले महीनों में कभी देहरादून में चर्चा का सिलसिला जारी रहेगा, यह निष्कर्ष कम आश्वस्तकारी नहीं.

- नवीन जोशी



बाईस सितम्बर को अल्मोड़ा में शमशेर की याद में हुई बहुत अच्छी जुटान ने दो बातें स्पष्ट कीं. पहली यह कि उत्तराखण्ड और उसके बाहर भी शमशेर का बहुत सम्मान था. बहुत सारे लोग उसे सामाजिक-राजनैतिक मोर्चे पर एक विश्वसनीय प्रतिरोधी आवाज के तौर पर देखते थे. उसके जाने से उपजे शून्य को दूर-दूर तक महसूस किया जा रहा है. इनमें विभिन्न विचारधाराओं के लोग हैं. जो दल या संगठन शमशेर की विचारधारा के साथ नहीं थे या आंशिक रूप से थे, वे भी उसके ईमानदार, पारदर्शी, जनमुखी संघर्ष के दिल से प्रशंसक थे. इसलिए बहुत सारे लोग उसे श्रद्धांजलि देने दूर-दूर से आए.

दूसरी बात यह कि देश और उत्तराखण्ड के वर्तमान हालात से चिंतित-व्यथित बहुत सारे लोग और संगठन सुधार या बदलाव के लिए बेचैन हैं. शमशेर-स्मृति के बहाने वे एक रास्ते की तलाश में हैं. ऐसे बहुत सारे जन अल्मोड़ा पहुंचे थे. लम्बी चली बातचीत से यह भी पता चलता है कि विकल्प की तलाश और बदलाव की आकांक्षा के अलग-अलग स्तर हैं किंतु एक तड़प सबमें है. यह बात भी साफ हुई कि पुराने संगठनों के बचे-खुचे ढांचे में युवाओं की भागीदरी न्यूनतम है. गांवों से भी सम्पर्क लगभग कट गया है. लगभग समान सोच होने के बावजूद सबके अपने-अपने कोने हैं. सबको लगता है कि हम ही ईमानदारी से लड़ रहे हैं. साथ होने की ऊपरी चाह के भीतर परस्पर अविश्वास की दरारें कम नहीं.

अल्मोड़ा में औपचारिक- अनौपचारिक बातचीत में देश में बढ़ते उग्र हिंदू-राष्ट्रवाद, मॉब लिंचिंग, कश्मीर के हालात, एनसीआर (नेशनल सिटीजन रजिस्टर), साइबर-दुष्प्रचार, आदि को लेकर गम्भीर चिंता उभरी तो उत्तराखण्ड में जल-जंगल-जमीन की खुली लूट, गांवों से तीव्र पलायन, जंगली जानवरों का आतंक, ऑल वेदर रोड से लेकर बड़े बांधों एवं पर्यटन नीति से उजड़ते हिमालय, महिला-मुद्दों, शिक्षा की दुर्दशा, चिकित्सा और अन्य आवश्यक सुविधाओं के अभाव, राजधानी गैरसैण जैसे मुद्दों पर गुस्सा दिखाई दिया.


‘शमशेर का रास्ता’ बातचीत का फोकस था जो शाम के सत्र में कुछ भटकावों के बाद देर रात कुछ गम्भीर विमर्श में बदला. अल्मोड़ा महाविद्यालय के छात्र नेता से लेकर ‘पर्वतीय युवा मोर्चा’, ‘उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ और ‘उत्तराखण्ड लोकवाहिनी’ तक शमशेर का रास्ता जन-संघर्षों का था. वह कोई बना-बनाया रास्ता नहीं था. प्रयोगों और भटकनों के बाद वह आगे बढ़ता रहा था. गाँव-गाँव की यात्राएँ, जनता से सघन सम्पर्क, सम्वाद तथा उनकी छोटी-छोटी लड़ाइयों को बड़ा फलक देने की निरंतर कोशिश उस रास्ते को आगे ले जाती रहे. उस पर चलते हुए कुछ लड़ाइयां लड़ी गईं, कुछ जीती गईं और कुछ रियायते हासिल की गईं.


यह भी सच है कि वह रास्ता किसी राजनैतिक विकल्प तक नहीं पहुंचा. अलग राज्य बनने के बाद निरंतर जन-विरोधी होती स्थितियों में वह रास्ता किसी साफ और चैड़े मार्ग में नहीं खुला. जन-संघर्षों के लिए देश भर में पहचाने जाने के बावजूद शमशेर का रास्ता उत्तराखण्ड राज्य में प्रभावकारी हस्तक्षेप नहीं कर सका, हालांकि प्रतिरोध के स्वर यथासम्भव उठते रहे. संगठन बिखरा, टूटा और कमजोर पड़ा. शमशेर वैचारिक स्तर पर अपने मोर्चे पर डटा रहा. बीमारियों के लम्बे दौर और अंतिम दिनों में अक्सर अकेले या चंद साथियों के साथ चिंता-चर्चा में शामिल. उस पड़ाव से आगे का रास्ता खोलने वाले कदम नहीं दिखे.


शमशेर के जाने के बाद उसके रास्ते पर बात करते और आगे का रास्ता तलाशते हुए यह विचार करना अत्यंत आवश्यक है कि जन-संघर्षों का वह रास्ता ठहर गया था या कि उस पर चलने वाले? जन-संघर्षों से वन-आंदोलन में कुछ सफलताएं हासिल की गईं थीं. ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन ने भी कुछ मोर्चे जीते थे. इसके अलावा कई स्थानीय मोर्चों पर प्रभावकारी हस्तक्षेप किए जा सके, जैसे तवाघाट विस्थापितों का पुनर्वास या फलेण्डा, आदि. पृथक राज्य आंदोलन ने भी अपना आधा-अधूरा लक्ष्य हासिल किया, हालांकि उसमें शमशेर के रास्ते से विपरीत चलने वाले भी पूरी तरह शामिल थे.

जन-संघर्षों का रास्ता तब तक गतिमान और धड़कता रहा, जब तक उसमें जन-भागीदारी रही. वन-आंदोलन और ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलनों में संघर्ष वाहिनी के पीछे जनता की जबर्दस्त भागीदारी थी. राज्य आंदोलन में तो पूरा उत्तराखण्ड उमड़ पड़ा था. राज्य बनने के बाद जन-आंदोलनों के जरिए सरकार पर जनता के दवाब की जब सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब संघर्ष वाहिनी का जन-समर्थन क्यों छीझता चला गया? इसका उत्तर तलाशे बिना आगे के रास्ते पर सारगर्भित बात शायद नहीं हो सकती.


बाईस सितम्बर की रात एक बजे चर्चा समेटते हुए जब प्रो शेखर पाठक कह रहे थे कि ‘शमशेर को सही श्रद्धांजलि यही होगी कि जहां वह फेल हुए वहां हम फेल नहीं हों’ तो संभवत: वे इसी ओर इशारा कर रहे थे. जन-संघर्षों का रास्ता जनता की व्यापक भागीदारी के बिना आगे नहीं जा सकता. राज्य बनने के बाद के इन वर्षों में संघर्ष वाहिनी और फिर लोक वाहिनी के पीछे जनता क्यों नहीं जुटी? क्या जनता से संगठन का सम्पर्क कम होता चला गया? क्या दूसरी-तीसरी लाइन तैयार नहीं हुई? क्या जनता से सम्वाद नहीं हुआ या हुआ तो उसके वास्तविक मुद्दों पर नहीं हुआ? क्या दूसरे दलों-संगठनों ने जनता को ज्यादा प्रभावित कर लिया?


यह कहना बहुत निर्मम हो जाना है कि उत्तराखण्ड के आज के सभी ‘जन-संगठन’ जन-संघर्षों के नहीं विज्ञप्तियों-गोष्ठियों के आंदोलनकारी बन कर रह गए हैं. क्या यह सच नहीं है? शमशेर और उसके जुझारू साथियों की एक सीमा होनी ही थी. लेकिन क्या उन्होंने अपनी दूसरी-तीसरी पंक्ति तैयार की? 1970 के दशक के वे जबर्दस्त जुझारू लड़के आज बूढ़े हैं लेकिन क्या वे ही संगठनों को नहीं चला रहे? और क्या इसीलिए वे संगठन छोटी-छोटी गोष्ठियों, चंद जनों के धरना-प्रदर्शनों और विज्ञप्तियों-बयानों वाले नहीं रह गए?


बाईस सितम्बर की रात एक बजे तक जो बीस-तीसेक लोग शिखर होटल के सभा-कक्ष में रह गए थे, उनमें ज्यादातर साठ-पार थे. कुछ ही थे तीस-चालीस वाले. बीस-तीस की उम्र वाले तो मुश्किल से दो-तीन. और, उस चर्चा में यह चिंता बार-बार उभर कर आई कि हमारे साथ नई पीढ़ी क्यों नहीं है? हमारे साथ युवा क्यों नहीं हैं? हमारी पहुँच गांव एवं ग्रामीणों तक क्यों नहीं है?


युवा पीढ़ी को लेकर भी खूब शंकाएं व्यक्त की गईं कि उस पर इम्तहानों-नौकरियों में अच्छा करने का इतना दवाब है कि सामाजिक-राजनैतिक प्रश्नों और उनमें भागीदारी के लिए उसके पास समय ही नहीं है. यह एक चुनौती जरूर है लेकिन जन-संघर्षों की यही परीक्षा भी है. मुद्दों, कार्यक्रमों और आंदोलनों में युवाओं को खींच लाने की अपील होनी चाहिए. हर समय में हर समाज में युवा पीढ़ी ने ही बदलाव की लड़ाई लड़ी है और समाज के लिए अपने करिअर दाँव पर लगाए हैं. युवा आगे नहीं आ रहे हैं तो कमजोरी उनकी नहीं, नेतृत्त्व की है.


अब बात आज के ज्वलंत मुद्दों की. राष्ट्रीय स्तर पर कुछ बड़े मुद्दे हैं. ऐसा लगता है कि उग्र हिंदू राष्ट्रवाद ने देश के बहुमत को ग्रस लिया है. इस हिंदुत्व लहर के कारण ही वह सब ‘ऐतिहासिक न्याय’ लग रहा है जो कश्मीर में हो रहा है. सिटीजन रजिस्टर का भी व्यापक स्वागत हो रहा है, भले ही एक बड़ी आबादी त्रास में जी रही हो. भयानक मंदी, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की दुर्दशा, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता के हनन, मॉब लिंचिंग, आदि विकट समस्याओं पर पाकिस्तान- विरोधी नारा हावी है. कुमाऊँनी में जिसे कहते हैं ‘मुनि हालौ’ वैसा ही आरएसएस-भाजपा ने जनता के साथ कर दिया है.

यहां योगेंद्र यादव की बात दोहराना चाहूंगा. ‘आरएसएस 90 साल तक जनता के बीच लगा रहा. क्या हमने 90 दिन भी जनता के बीच बिताए?’ संघ वर्षों से लगा था और जब कांग्रेस से लेकर वाम दल तक जनता के बीच से गायब होते गए तो उसे खुला मैदान मिल गया. यह जितनी संघ-भाजपा की जीत है उतनी ही कांग्रेस और वाम दलों की हार है. इसमें हम अन्य प्रगतिशील संगठनों को भी शामिल कर सकते हैं. क्या यह चिंतनीय नहीं है कि नेहरू की विचार-हत्या के इस दौर में नेहरू के वारिस ही उनका योगदान बताने के लिए जनता के बीच नहीं जा रहे? गांधी की हत्या करने वाले गांधी को ब्राण्ड बनाकर गांधी के विचार के विरुद्ध अपना एजेण्डा चला रहे हैं और बाकी लोग हतप्रभ बैठे हैं?

संघ-भाजपा को हराने के लिए जनता के बीच ही जाना होगा और उसके लिए मुकम्मल तैयारी चाहिए. शमशेर-स्मृति के पहले सत्र में जब प्रशांत भूषण संघ-भाजपा का कच्चा चिट्ठा खोलते हुए नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहरा रहे थे तब रैमजे सभागार में मेरे पीछे बैठी महिलाएं धीमे स्वर में असहमति जता रही थीं. यह बताता है कि हमारी चुनौती कितनी बड़ी है.

उत्तराखण्ड के जवलंत मुद्दों की स्थिति और भी विषम है. जमीन का मुद्दा ले लीजिए. कांग्रेस और भाजपा की सरकारों ने राज्य में जमीनों की खुली लूट के लिए बार-बार कानून बदले. आज यह स्थिति है कि कोई भी कहीं भी बड़ी जमीन खरीद सकता है. भू-उपयोग बदलने की भी जरूरत नहीं. इस मनमाने कानून के खिलाफ अखबारी बयानों के अलावा कहां कोई आंदोलन हुआ? द्वारसौं-नानीसार में उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के पीसी तिवारी के प्रयत्नों से एक आंदोलन खड़ा हुआ था. वह बढ़िया मौका था जब राज्य की सारी परिवर्तनकामी शक्तियां एकजुट होकर इसे राज्यव्यापी बड़ा मुद्दा बना सकती थीं. उस समय भी समर्थन में सिर्फ बयान आए. पीसी आज भी अकेले नानीसार की कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं.


इस बीच और जमीनों के बड़े सौदे हो गए और हो रहे हैं. कहीं शराब फैक्ट्री खुल गई. औली बुग्याल में सारे नियम-कानूनों और हिमालय की चिंता को ताक पर रख कर एक धनपशु का ब्याह-समारोह खुद सरकार ने ही करा डाला. विरोध में बयान खूब आए लेकिन हुआ कोई आंदोलन? जिस जनता को आंदोलन में साथ खड़ा होना चाहिए था वह एक जोड़ी धोती-पाजामा और भोजन के लिए लपक रही थी. इसलिए कि उनके बीच काम करने वाले, सचेत करने वाले संगठन और कार्यकर्ता नहीं थे. जनता को दोष नहीं दिया जा सकता.


किसी समय उत्तराखण्ड में हिमालय कार रैली के विरोध में सड़कों पर उतरने वाली संघर्षवाहिनी के यहां-वहां बिखरे और अब बूढ़े हो गए नेता-कार्यकर्ता औली बुग्याल के दमन पर बयान जारी करने के अलावा क्या कर पाए? किस बेरहमी से ऑल वेदर रोड बन रही है, हजारों पेड़ कट रहे हैं और पहाड़ों का मलबा नदियों की गोद में भर रहा है. निंदा हो रही है लेकिन जमीन पर संघर्ष के संकेत तक नहीं.


नशे का कारोबार भयानक स्थिति में है. जन-संघर्ष के लिए मुद्दों की तलाश की चर्चा में एक प्रतिभागी ने कहा कि शराब के विरुद्ध अब जनता साथ नहीं आएगी क्योंकि दावतों में सबसे पहले महिलाएं गिलास लेकर खड़ी हो जाती हैं. यह वक्तव्य बताता है कि शराब के खिलाफ और भी जोरदार आंदोलन की आवश्यकता है. नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन मुख्यतः महिलाओं ने चलाया था. आज उनमें भी नशे की लत व्याप रही है तो वह और भी बड़ा मुद्दा बन सकता है.


उत्तराखण्ड की जनता को क्या-क्या मुद्दे प्रमुख रूप से उद्वेलित कर रहे हैं, इसके लिए किसी होटल के हॉल में चर्चा की बजाय गांव-कस्बों में जनता के बीच बैठने की ज्यादा जरूरत है. पंचेश्वर बांध विरोधी साथियों की पद-यात्राओं से एक त्रासद सच्चाई सामने आई. प्रवासी लोग अपनी जमीनों का मुआवजा पाने की लालच में बांध समर्थक बन गए तो डूब क्षेत्र में रहे-बचे काफी लोग इस उम्मीद में हैं कि शायद मुआवजा उन्हें कहीं तराई या मैदानों में बसने में मदद करेगा. टिहरी बांध और पंचेश्वर बांध के बीच उजड़ते पहाड़ में यह नया त्रासद पक्ष विकसित हो गया. इस आधार पर यह तो नहीं कहा जा सकता कि पंचेश्वर बांध विरोधी आंदोलन को जन-समर्थन नहीं मिलेगा या इस मुद्दे से जनता एकजुट नहीं होगी. मुआवजे का घिनौना खेल टिहरी में भी चला था.


कहने का मतलब यह कि जो हालात आज उत्तराखण्ड के हैं और देश के भी उनमें जन-आंदोलनों के पर्याप्त अंकुर मौजूद हैं. जनता के बीच से और भी मुद्दे मिल जाएंगे. 1970 के दशक से 2019 आते-आते उत्तराखण्ड की जनांकिकी बदल गई और नए मुद्दे खड़े हो गए. जरूरत नेतृत्वकारी संगठनों के जमीन तक पहुंचने की है. बिखरी ताकतों को एकजुट होकर साझा प्रयास करने की आवश्यकता है. अल्मोड़ा की चर्चा में यह केंद्रीय स्वर था.


एक साझा मंच बनाकर चुनाव लड़ने और सत्ता में सीधे हस्तक्षेप करने लायक स्थितियां शायद किसी दल या संगठन की नहीं है. इसीलिए ऐसे सुझाव पर लगभग मौन या अस्वीकार रहा. विभिन्न स्थानीय दलों व संगठनों ने पिछले चुनाव में जो कोशिश की वह किसी की भी दो-ढाई हजार वोट से आगे नहीं पहुंची. इससे भी यही साबित होता है कि उनकी जड़ें जनता में नहीं है.


उत्तराखण्ड की जनता और हिमालय फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के लूटतंत्र में ही उजड़ने को अभिशप्त हैं. जन-संगठनों की सत्ता में भागीदारी हुए बिना नीति स्तर पर बदलाव कैसे होगा, यह बड़ा प्रश्न बना रहेगा. शमशेर और साथियों ने चुनाव से दूर रहने का शुरुआती फैसला बाद में पलट दिया था तो कुछ सोच-समझ कर ही पलटा होगा. यह भी गौर किया जाना चाहिए कि 1970-90 के दशक की सरकारें आंदोलनकारियों कुछ रियायतें दे देती थीं. नया निजाम असहमति और विरोध का सीधे दमन करने वाला है.


अल्मोड़ा विमर्श का हासिल यह है कि सभी लोगों में तड़प है और उन्हें साझा मंच की आवश्यकता समझ में आती है. लेकिन यह अपनी-अपनी निजी पहचान को गलाकर समर्पित हुए बिना व्यावहारिक रूप शायद नहीं लेगा. इसके लिए लोग कितने तैयार होंगे? युवाओं को अधिक से अधिक जोड़ने और जनता के बीच जाने का चुनौतीपूर्ण काम कैसे होगा? बहरहाल, आने वाले महीनों में कभी देहरादून में चर्चा का सिलसिला जारी रहेगा, यह निष्कर्ष कम आश्वस्तकारी नहीं.

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