'पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती', जेएनयू और मोहन थपलियाल

मोहन थपलियाल को हाईस्कूल तक पढ़ने के बाद आईटीबीपी में नौकरी करने जाना पड़ा और इंटर तक नौकरी के साथ उन्होंने प्राइवेट पढ़ा. वही मोहन थपलियाल, न केवल पढ़ पाये, बल्कि जर्मन साहित्य के मर्मज्ञ भी हो पाये तो इसलिए कि जे.एन.यू. ने उन्हें यह अवसर दिया.

- इंद्रेश मैखुरी 


जे.एन.यू. के ख़िलाफ़ विषवमन करते हुए यह बात सबसे ज्यादा उछाली जा रही है कि वहाँ तो अधेड़ उम्र वाले, विद्यार्थी बने रहते हैं.


वैसे तो यही देश है, जहां एक समय कहा जाता था कि 'पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती'. व्हाट्स एप युनिवर्सिटी के जमाने में लगता है कि नया नारा गढ़ लिया गया है कि 'पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं होती!'


जिन्होंने किसी अभाव की वजह से नहीं बल्कि लफंगई, लंपटई के चलते विश्वविद्यालय तो छोड़िए ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा का मुंह भी नहीं देखा, वे भी आजकल जे.एन.यू. के ख़ात्मे का फ़तवा बाँट रहे हैं.


अभी कुछ दिन पहले उत्तराखंड में पंचायत के चुनाव हुए और भाजपा की सरकार ने चुनाव लड़ने के लिए शैक्षणिक योग्यता निर्धारित कर दी. शैक्षणिक योग्यता कितनी-सामान्य जाति के पुरुष के लिए दसवीं पास. पता चला कि भाजपा के ही कई तुर्रम खाँ पंचायत चुनाव लड़ने के काबिल ही नहीं निकले,बूढ़े नहीं कई युवा हृदय सम्राट भी !


क्यूँ? क्यूंकि नेता तो वे बड़े भारी थे, लेकिन दसवीं पास नहीं थे ना! तो जो पंचायत चुनाव लड़ने के लिए भी क्वालिफाइड नहीं थे, वे चाहते हैं कि जे.एन.यू. की बंदी के रुक्के पर दस्तखत करने के अथॉरिटी वो बन जाएँ !


अब थोड़ा तथ्यों पर गौर करते हैं. एक समय में देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव होते थे और चुनाव लड़ने के लिए उम्र की कोई बंदिश न थी. तो 30-32 बरस के छात्र नेता भी विश्वविद्यालयों में आम परिघटना थे.

लेकिन वर्ष 2006 से लिंगदोह कमेटी की सिफ़ारिशों के अनुसार चुनाव लड़ने की आयु सीमा निर्धारित है. वो सीमा है पीएच.डी. में 28 वर्ष. तो 28 वर्ष से अधिक वाला तो छात्र नेता भी नहीं हो सकता, देश के किसी विश्वविद्यालय में.


हालांकि जिस जमाने में हो सकता था, तब भी जे.एन.यू. में ऐसा नहीं होता था. लिंगदोह कमेटी ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने के क्रम में जब देश भर के कैम्पसों का दौरा किया तो उसे सबसे उम्रदराज छात्र नेता जो मिला वो 44 साल का मिला. पर 44 साल का यह छात्र नेता जे.एन.यू. में नहीं, उत्तर प्रदेश के एक बड़े विश्वविद्यालय में था. जे.एन.यू. के छात्र संघ चुनाव को तो लिंगदोह कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में आदर्श चुनाव बताया था.


पर इस सारी बात से शीर्षक में जिन मोहन थपलियाल का उल्लेख है, उनका क्या संबंध है ? उत्तराखंड में ही जे.एन.यू. के खिलाफ विषवमन करने वालो,तुम जे.एन.यू. में पढे हुए किसी मोहन थपलियाल का नाम जानते हो ?


नहीं जानते होगे, क्यूंकि वे व्हाट्स एप्प में घृणा भरे संदेशों के प्रसार और उसी को सच्ची शिक्षा मानने का दौर आने से पहले ही दुनिया से रुख़सत हो गए थे.


दरअसल जे.एन.यू. के खिलाफ अभियान में उम्रदराज छात्रों का जो जुमला उछाला जा रहा है, उसे समझने के लिए मोहन थपलियाल को जानना सबसे सही तरीका है. 1942 में टिहरी में जन्में मोहन थपलियाल वो व्यक्ति थे, जिन्होंने 1973 में यानि 31 वर्ष की उम्र में प्रवेश परीक्षा पास करके जे.एन.यू. में दाखिला लिया था.


इतने उम्रदराज व्यक्ति का प्रवेश लेना,उस दौर में भी जे.एन.यू. में एक अलग तरह की बात थी. इसलिए मोहन थपलियाल जे.एन.यू. में “अंकल” के नाम से लोकप्रिय हुए. लेकिन इसमें दो बात और जानने की हैं.


पहली यह कि इतनी बड़ी उम्र में जे.एन.यू. में प्रवेश लेने से पहले मोहन थपलियाल करते क्या थे और दूसरी बात यह कि जे.एन.यू. में पढ़ कर उन्होंने किया क्या? जे.एन.यू. में पढ़ने आने से पहले वे आई.टी.बी.पी. यानि भारत तिब्बत सीमा पुलिस में नौकरी करते थे. वो नौकरी छोड़ कर जे.एन.यू. में पढ़ने आए थे. जे.एन.यू. में प्रवेश ले कर मोहन थपलियाल ने जर्मन भाषा पढ़ी. उसका साहित्य जाना.


जर्मनी के ही नहीं विश्व के बड़े कवि और नाटककार हुए बर्तोल्त ब्रेख्त. ब्रेख्त का मूल जर्मन से हिन्दी में अनुवाद किया मोहन थपलियाल ने. एक बड़े हिस्से तक ब्रेख्त को हिन्दी में पहुंचाने का श्रेय मोहन थपलियाल को जाता है. पत्रकार और कहानीकार भी थे मोहन थपलियाल.


मोहन थपलियाल को हाई स्कूल तक पढ़ने के बाद नौकरी करने जाना पड़ा और इंटर तक नौकरी के साथ उन्होंने प्राइवेट पढ़ा. वही मोहन थपलियाल, न केवल पढ़ पाये, बल्कि जर्मन साहित्य के मर्मज्ञ भी हो पाये तो इसलिए कि जे.एन.यू. ने उन्हें यह अवसर दिया. जे.एन.यू. इसीलिए चाहिए, एक नहीं, कई-कई चाहिए ताकि ऐसे हर व्यक्ति को पढ़ने और आगे बढ़ने का अवसर मिले,जो ऐसा चाहता है.

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