एक नदी थी साहिबी

लोग तो मंदिर-मस्जिद के झगड़े में उलझे हुए हैं। वे मंदिर-मस्जिद को रीक्लेम करेंगे। इतिहास की गलतियां ठीक की जाएंगी। लेकिन, एक नदी को बेमौत मार डालने वाली इस ऐतिहासिक गलती को कौन ठीक करेगा?

- कबीर संजय



साहिबी एक नदी थी। कभी यह राजस्थान और हरियाणा की यात्रा पूरी करके दिल्ली पहुंचती थी। फिर यमुना में मिल जाती थी। अब यह नजफगढ़ ड्रेन में तब्दील हो चुकी है। दिल्ली के सबसे बड़े नालों में से यह एक है। जो हमारे घरों के सीवर को एकत्रित करते हुए उसे यमुना नदी तक पहुंचा देता है।

साहिबी या साबी नदी एक तरह की बरसाती नदी थी। यह नदी जयपुर के पास जीतगढ़ नामक स्थान से निकलती थी। इसके बाद यह अलवर, रेवाड़ी पटौदी (गुड़गांव) होते हुए दिल्ली पहुंचती थी। अरावली से निकलने वाली इस प्रमुख नदी में तमाम बरसाती नालों का पानी एकत्रित होता था जो कि आगे चलकर यमुना में गिर जाता था। इस नदी के चलते इसके रास्ते में कई बड़े-बड़े वेटलैंड या नमभूमि बनती थी। जहां पर पक्षियों के बड़े पर्यावास थे। नजफगढ़ झील उनमें से एक है। इस झील के आसपास आज भी पक्षियों की बड़ी तादाद आती है।

पुराने नक्शों में भी इस नदी का अस्तित्व मौजूद है। वर्ष 1967 और 1977 में इस नदी में भयंकर बाढ़ आई थी। जिसका पानी जनकपुरी तक पहुंच गया था। छिछले होकर बहने के चलते इस नदी का पानी काफी समय तक निचली जमीनों पर भरा रहता था। जिसके चलते भूमिगत जल के रीचार्ज होने की समस्या यहां पर नहीं थी।

लेकिन, 1977 में आई बाढ़ के बाद इस नदी के पानी को एक नाला बनाकर नियंत्रित करने का प्रयास किया। नदी का रूट समाप्त हो गया, उसे एक पतली सी लकीर में कैद कर दिया गया। अलवर, रेवाड़ी और गुरुग्राम और दिल्ली में जिस रास्ते से वह नदी गुजरती थी, उस रास्ते पर तमाम निर्माण खड़े हो गए। नदी का रास्ता रोक दिया गया। नदी गायब हो गई। अब नजफगढ़ ड्रेन सिर्फ नाले के पानी को यमुना तक पहुंचाने का काम करता था। आज भी इस पूरे इलाके में साहिबी या साबी नदी की यादें मौजूद हैं। पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों को भी इनकी यादें हैं। लेकिन, नदी गायब है और नाला मौजूद है।

इस नदी के समाप्त होने से क्या हुआ। अभी थोड़ी सी बरसात होते ही जलभराव एक बड़ी समस्या बन जाता है। शहरों में भूमिगत जल तेजी से नीचे जा रहा है। नदी के रास्ते पर कब्जे के चलते यह समस्याएं पैदा हुई हैं। लेकिन, इस पर कोई क्या ध्यान देगा। ध्यान देगा भी कौन। लोग तो मंदिर-मस्जिद के झगड़े में उलझे हुए हैं। वे मंदिर-मस्जिद को रीक्लेम करेंगे। इतिहास की गलतियां ठीक की जाएंगी। लेकिन, एक नदी को बेमौत मार डालने वाली इस ऐतिहासिक गलती को कौन ठीक करेगा?


(तस्वीर इंटरनेट से है और नजफगढ़ झील की है। यहां पर अभी भी ढेरों राजहंस यानी फ्लेमिंगो सर्दियों के मौसम में आते हैं और फरवरी-मार्च तक रहते हैं)

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