रूस में व्लादिमीर पुतिन का एकछत्र राज, अमेरिका के लिए चुनौती

Updated: Jul 2, 2020

साल 2024 में अपना मौजूदा कार्यकाल खत्म कर रहे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन रूस के संविधान में एक बड़े बदलाव की तैयारी में हैं. रूस के लोगों ने इस बदलाव के पक्ष में मतदान किया तो आगे क्या परिणाम होंगे इसपर रोशनी डाल रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार, सत्येंद्र रंज

- Satyendra Ranjan


व्लादिमीर पुतिन के इस कदम के रूस के लिए यह निहितार्थ हैं कि इससे अगले 16 साल के लिए वहां एक सशक्त और एक व्यक्ति के नियंत्रण वाली व्यवस्था मजबूत हो जाएगी। जहां तक रूस में व्लादिमीर पुतिन की ताकत पर नियंत्रण और संतुलन का सवाल है हमने पिछले दो दशकों में देखा है कि वे सत्ता में शक्ति का एकमात्र केंद्र रहे हैं।


पुतिन सोवियत संघ के जमाने की खुफिया एजेंसी केजीबी के अधिकारी रह चुके हैं। केजीबी उस दौर में अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के समकक्ष माना जाता था। बाद में बोरिस येल्तसिन के समय सोवियत संघ का विखंडन हुआ, जिनमें न तो राजनीतिक नेतृत्व की क्षमता थी न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के वैभव और यश को बरकरार रखने की कुशाग्रता।


अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी ताकतों ने येल्तसिन के दौरान में परोक्ष रूप से सोवियत संघ की सत्ता चलाने की कोशिश की। येल्तसिन के शासन के दस साल सोवियत संघ में लूट के साल थे। सत्ता के करीब रहे कुछ ताकतवर लोगों ने देश के प्राकृतिक संसाधनों का जमकर दोहन किया। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की लूटकर वे अमीर बन गए।


ऐसी पृष्टभूमि में जब पुतिन ने येल्तसिन के बाद रूस की सत्ता संभाली तब माना गया कि अराजकता के बीच उन्होंने व्यवस्था कायम की। जिस रूस को पश्चिमी देशों का पिछलग्गू और उनके हाथों की कठपुतली माना जाने लगा था, उसे आते ही उन्होंने एक स्वतंत्र ताकत के रूप में स्थापित करने की कोशिश शुरू कर दी। यह पुतिन की राजनीतिक पूंजी है, जिसकी वजह से वह रूस मे मजबूत हुए।


पहले वह आठ वर्ष राष्ट्रपति रहे और जब आगे देश का नेतृत्व करना चाहा तो संवैधानिक अड़चन सामने आ गई। तब वह प्रधानमंत्री बन गए और अपने करीबी और विश्वस्त दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बनवा दिया। माना जाता रहा कि फिर पर्दे के पीछे से सबकुछ अपने नियंत्रण में रखा और राष्ट्रपति के रूप में परोक्ष रूप से पुतिन ही काम करते रहे।


चार वर्ष बाद जब यह अड़चन खत्म हो गई तो वह फिर से राष्ट्रपति बन गए। फिर संविधान में संशोधन कर राष्ट्रपति का कार्यकाल चार से बढ़ाकर छह वर्ष कर दिया और दो कार्यकाल तक पद पर रहने का कानून बना दिया। इस तरह 2012-2024 तक उनका कार्यकाल है।


ताजा घटनाक्रम से साफ है कि उनकी महत्वाकांक्षा यहीं खत्म नहीं हुई है। वह आजीवन रूस के राष्ट्रपति बने रहना चाहते हैं। अभी वह 67 वर्ष के हैं, अगर अभी प्रस्तावित संशोधन पर देश की जनता मुहर लगा देती तो वह 2036 तक यानी 83 वर्ष की उम्र तक राष्ट्रपति बने रहेंगे।


कुल मिलाकर जिस तरह आज पूरी दुनिया में ताकतवर नेताओं का उभार देखने को मिल रहा है, जो संविधान के तहत नियंत्रण और संतुलन के नियमों से परे होते हैं, और चुनाव केवल दिखावे के लिए ही कराए जाते हैं। वैसी ही छवि रूस में पुतिन बना चुके हैं।


2000 में जब पहली बार पुतिन सत्ता में आए थे, तब ही वह ऐसे नेता की छवि गढ़ चुके थे। दुनिया के बाकी हिस्सों में यह चीज बाद में आई। रूस की आंतरिक राजनीति के हिसाब से देखें तो वहां दूसरे राजनीतिक दल को उभरने ही नहीं दिया जाता।


2019 में मॉस्को के मेयर के चुनाव को देखें तो ऐसा माना जा रहा था कि कड़ा मुकाबला होने जा रहा है और शायद पुतिन की पार्टी न जीत पाए। तब मुखर विरोधियों को अयोग्य करार दे दिया गया। फिर भी विरोधियों के समर्थन से कुछ निर्दलीय जीते, जिससे पता चला कि पुतिन की लोकप्रियता कुछ कम हुई है। लेकिन सरकार की मशीनरी पर उनकी मजबूत पकड़ होने के कारण सत्ता में बने हुए हैं।


विश्व राजनीति में पुतिन की भूमिका

विश्व की राजनीति पर पुतिन के काफी ज्यादा असर डाला है। उन्होंने जितना प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से नहीं डाला उससे अधिक परोक्ष रूप से डाला है। मिसाल के तौर पर दुनियाभर में दूसरे देशों के चुनावों में दखल डालना। दूसरे देशों के चुनावों के मुद्दों को प्रभावित करने और वहां के जनमत को अपने ढंग से ढालने में बीसवीं सदी में अमेरिका को महारत हासिल थी और उसका एकाधिकार था।


यह काम अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए करती थी। अब तो इसके बारे में एक किताब भी आ गई है कि किस तरह सीआईए ने अलग-अलग देशों में सत्ता पलटी और चुनावों में दखल दिया। कैसे वहां की मीडिया में अपने लोगों को घुसाकर चुनावों क मुद्दों को नियंत्रित किया।


कुल मिलाकर इसमें अमेरिकी एकाधिकार को पुतिन ने तोड़ दिया। इस हद तक तोड़ दिया कि 2016 के अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव में रूस के दखल को लेकर चर्चा हुई। राष्ट्रपति ट्रंप पर इसी आरोप में महाभियोग भी चला। हालांकि इसमें युक्रेन का भी पहलू था, लेकिन मुख्य शिकायत थी कि रूस ने ट्रंप को जिताने के लिए फेसबुक के जरिए चुनाव प्रचार को प्रभावित किया।


आज रशिया टीवी एक बड़े प्रोपेगेंडा चैनल के रूप में स्थापित है। कहा जाता है कि अलग-अलग देशों में रूस समर्थित कई यूट्यूब चैनल हैं, जो वहां की आंतरिक राजनीति के हिसाब से असंतोष को कैसे भड़काया जा सकता है, इसको लेकर काम करते हैं। इसके बारे में ब्रिटेन, फ्रांस व जर्मनी जैसे पश्चिमी लोकतंत्रों में काफी सामग्रियां आज उपलब्ध हैं। ये सब पुतिन का असर रहा है।


अगर आगे भी पुतिन सत्ता में बने रहे तो यह काम आगे भी होता रहेगा। पश्चिमी देशों के लोकतंत्र को लेकर नैतिक बढ़त को खत्म करना पुतिन की प्राथमिकता रही है और वह इसमें काफी हद तक कामयाब भी रहे हैं। यहां तक कि ब्रेग्जिट होने में पुतिन के दुष्प्रचार अभियान की काफी भूमिका मानी जाती है। ये काम और आगे बढ़ेगा, जिससे एक बहुध्रुवीय दुनिया देखने को मिलेगी।