पहाड़ी खेती को किस इलाज की ज़रूरत?

"पहाड़ में आज भी 80% खेती जैविक है ,लेकिन इस जैविक कृषि के पास कोई प्रमाणन नहीं है , वैज्ञानिक पद्धति नहीं है ,जिस कारण इसका मूल्य आज भी बाजार में नहीं है , उत्तराखंड में जैविक खेती में पलायन को रोकने सुंअर और बंदरों के आतंक से बंजर होती खेती को आबाद करने का अचूक मंत्र छिपा है बशर्ते सरकार इस मंत्र को सिद्ध करने का जतन करें."

- प्रमोद साह


'सीड कंट्रोल एक्ट' 1960 ने भारत में खेती किसानी का सामाजिक, आर्थिक भूगोल बदल दिया है. अब किसान कितनी भी मेहनत करें उसके पसीने का बड़ा हिस्सा, प्रमाणिक बीज और रासायनिक खाद के रूप में बहुराष्ट्रीय कंपनी तक ज़रूर पहुंचेगा..


उत्पादन बढ़ाने के नाम पर प्रमाणिक बीज के दुष्चक्र ने खेती को घाटे का सौदा बना दिया है. महंगे बहुराष्ट्रीय बीच उसके बाद महंगी रसायनिक खाद फसल का उत्पादन मूल्य 40% बढ़ा देती है.


अंतर्राष्ट्रीय बीज और रासायनिक खाद से फसल अब ज़हर बन गई है. हांलाकि फसल का उत्पादन तो तीन गुना बढा है लेकिन देश में रासायनिक खादों के प्रयोग के बाद कैंसर की वृद्धि 2500 गुना बढ़ गई है.


कैंसर से बचने का उपाय कराहती मानवता ने जैविक खेती में देखा है.


इस दृष्टि से उत्तराखंड की परंपरागत कृषि जो कि अब छूटने की क़गार पर है, वह मानो उत्तराखंड को पुनरुत्थान का एक नया अवसर जैविक खेती के रूप में देने जा रही है। बशर्ते इसके लिए समाज में जागरूकता हो और सरकार के पास ऐसा करने का संकल्प और विजन हो.


हमारी परंपरागत कृषि जिसका बीज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रमाणिक बीज ना होकर, हमारे स्थानीय समाज में सदियों से प्रचलित व संरक्षित 'बारहनाजा' है. वह अपने स्वभाव में जैविक ही है.


पहाड़ में आज भी 80% खेती जैविक है, लेकिन इस जैविक कृषि के पास कोई प्रमाणन नहीं है, वैज्ञानिक पद्धति नहीं है. इस कारण इसका मूल्य आज भी बाज़ार में नहीं है. उत्तराखंड में जैविक खेती में पलायन को रोकने सूअर और बंदरों के आतंक से बंजर होती खेती को आबाद करने का अचूक मंत्र छिपा है, बशर्ते सरकार इस मंत्र को सिद्ध करने का जतन करें.


उत्तराखंड में शुरुआत

रासायनिक खादों के प्रयोग से लोक स्वास्थ्य पर बढ़ते असर को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2000 से जैविक खेती को प्रोत्साहन देने के लिए 20 संस्थाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों के साथ जैविक खेती हेतु मिट्टी बीज, फसल और प्रसंस्करण को प्रमाणित करने का अधिकार दिया है.


उत्तराखंड में जैविक भूमि एवं उत्पाद के परीक्षण का अधिकार एपीडा अर्थात एग्रीकल्चर एंड प्रोसैस्ड फूड डेवलपमेंट अथॉरिटी को प्राप्त है.


उत्तराखंड में जैविक खेती के मंत्र से, पलायन, बंजर होती खेती, पर्यावरण और पहाड़ की आर्थिकी का एक साथ समाधान निकल सकता है.


इसके लिए हमारे समान भौगोलिक परिस्थिति के राज्य सिक्किम में भौगोलिक खेती के क़ामयाबी का मॉडल जिसने सिक्किम को पूर्णतया रासायनिक खादों से मुक्त राज्य बना दिया अपनाने के लिए हमारे पास है.


सिक्किम मॉडल

सिक्किम ने साल 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पवन चामलिंग के नेतृत्व में मत प्राप्त कर राज्य की 75 हज़ार हेक्टेयर भूमि को जैविक खेती का क्षेत्र घोषित किया, जिसमें 66 हजार परिवारों की भागीदारी हुई.


सरकार ने क्षेत्र में रासायनिक खादों का प्रयोग और बिक्री प्रतिबंधित करते हुए उसे संज्ञेय अपराध घोषित किया, 3 माह का कारावास और ₹1 लाख के जुर्माने का प्रावधान किया. इस कठोर प्रावधान से रासायनिक खाद का चलन बंद हुआ और जैविक खेती का रास्ता साफ हुआ.


इस प्रकार सहकारिता के नए मॉडल को विकसित करते हुए सिक्किम 2016 में देश का पूर्ण जैविक खेती का राज्य घोषित हो गया, किसानों की आमदनी के साथ पर्यावरण और पर्यटन में भी बृद्धि हुई.


उत्तराखंड में जैविक खेती के क्या हैं प्रावधान?

जैविक खेती केंद्रीय कृषि मंत्रालय की योजना है इस नाते उत्तराखंड में जैविक कृषि बोर्ड तथा जैविक उत्पादों को बिक्री के लिए जैविक उत्पाद परिषद का गठन किसान भवन देहरादून में किया गया है. जैविक खेती का प्रशिक्षण देने हेतु मजखाली रानीखेत में प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की गई है.


यद्यपि उत्तराखंड में जैविक खेती प्रमाणन के लिए कोई न्यूनतम भूमि के रकबा का मानक नहीं है, लेकिन आमतौर पर यह न्यूनतम 20 हेक्टेयर भूमि अर्थात 50 एकड़ के साथ प्रारंभ करना लाभप्रद होता है.


उत्तराखंड में जैविक कृषि का विकास हो इसके लिए ज़रूरी है कि किसानों की सहकारी समितियों का गठन हो अथवा विशेष भूमि कानूनों के प्रावधानों के साथ चकबंदी लागू हो, तभी इतने बड़े रकबे को किसान प्राप्त कर सकता है.


कोई भी किसान अथवा किसान समितियां यदि अपनी भूमि को जैविक बनाने हेतु 3 चरणों में उसका परिक्षण करा कर जैविक खेती और उत्पाद का प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकता है. यह परीक्षण उत्तराखंड में एपीड़ा द्वारा किया जाता है.


परीक्षण से पूर्व जनपद के मुख्य कृषि अधिकारी अथवा सचिव कृषि बोर्ड किसान भवन देहरादून के समक्ष आवेदन प्रस्तुत हो. जिसमें भूमि स्वामित्व के दस्तावेज़, भूमि मानचित्र, भू स्वामियों के संयुक्त हस्ताक्षर सहित आवेदन होने पर पहले भूमि का रासायनिक खाद मुक्त होने का परिक्षण, उसके बाद बीज, उसके बाद फसल के मध्य में पुन: मिट्टी का परीक्षण फसल का परीक्षण सफल होने पर उत्पाद के जैविक होने का प्रमाण पत्र निर्गत होता है.


इसके आधार पर फसल की बिक्री हेतु जैविक उत्पाद परिषद, देहरादून खरीदारों से किसान की मध्यस्थता करता है.


जैविक कृषि से किसान की आमदनी कम से कम खर्च से दो से तीन गुना तक बढ़ जाती है.


प्रमोद साह उत्तराखंड पुलिस में कार्यरत अधिकारी हैं.