हिमालय क्या है और क्या हैं इसकी चुनौतियां?

हालाँकि कवियों ने हिमालय को अटलता, दृढ़ता का प्रतीक माना है परन्तु वास्तविकता यह है कि हिमालय अत्यंत भंगुर श्रेणिया है. ये विश्व की सर्वाधिक शैशव श्रेणिया हैं. इनके बनने की प्रक्रिया अभी भी बदस्तूर जारी है. इसी कारण यहाँ भूगर्भीय हलचलें होती रहती हैं और लगातार छोटे बड़े भूकंप आते रहते हैं.

- डॉ. एस पी सती


हिमालय की बात करना, भूमंडल पर 2500 किमी वर्तुलाकार एक उभरे हुए धरातल की बात करना मात्र नहीं है, जो लगभग 400 किमी चौड़ा है और एशिया के आठ देशों की सीमायें बांधता है. हिमालय इसलिए विश्व के सर्वाधिक महत्वपूर्ण भू-आकृत्तियों में से एक है, क्योंकि उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के बाद हिमालय ही ऐसा क्षेत्र है, जहां लगभग सर्वाधिक बर्फ़ विद्यमान है जो कि उच्च हिमालयी घाटियों में 5000 ग्लेशियरों में 12000 घन किलोमीटर तक विस्तारित है. इसी कारण इसे तीसरा ध्रुव भी कहते हैं.


हिमालय एवेरेस्ट सहित विश्व की कुछ सर्वाधिक ऊँची चोटियों के लिए भी जाना जाता है. जिनमें से क़रीब 50 से अधिक चोटियाँ 7200 मीटर से ऊँची हैं. हिमालय में क़रीब छ: करोड़ लोग निवास करते हैं, लेकिन इसके संसाधनों, जिनमें मुख्यतः गंगा, सिन्धु और स्वापो-ब्रम्हपुत्र तीन विशाल जलागमों में बहता जल-मिट्टी है, पर एशिया की लगभग साठ करोड़ जनसंख्या निर्भर करती है. यही नहीं इन जलागमों में सघन खेती और प्रचुर जैव विविधता, पर्यावरण के लिए कामधेनु का काम करती हैं.


हिमालय ना होता तो भारतीय मानसून ना होता और दक्षिण एशिया का अधिकाँश भाग सहारा मरुस्थल की तरह वीरान होता. अतः इस दृष्टि से सम्पूर्ण दक्षिण एशिया का जीवनदाता है हिमालय! विद्वानों का मत है कि भारतीय भूभाग में जिस अनूठी मानव संस्कृति का विकास हुआ, उसके विकसित होते रहने में हिमालय का बहुत बड़ा योगदान है.


हिमालय ने सुरक्षा दीवार के रूप में इस भू-भाग को बचाकर रखा है. मानसून के अतिरिक्त दक्षिण एशिया की सम्पूर्ण जलवायु पर हिमालय का व्यापक प्रभाव है. सर्दियों में योरोप से पूर्व की ओर बहने वाली सर्द हवाओं का अधिकाँश भाग हिमालय की श्रेणियों द्वारा उत्तर की ओर को परावर्तित कर दिया जाता है और सिर्फ़ एक छोटा हिस्सा ही भारतीय उप महाद्वीप में प्रवेश करता है. इसी कारण भारतीय उप महाद्वीप में जाड़ों में उतनी अधिक ठण्ड नहीं पड़ती, जितनी कि इन्हीं देशान्तारों पर योरोप में पड़ती है और यहाँ का मौसम अपेक्षाकृत सुगम बना रहता है. हिमालय के कारण भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग में बहने वाली अधिकाँश नदियाँ सदा नीरा हैं और यह जैव विविधता की प्रचुरता तथा सघन कृषि वाला क्षेत्र है.


पारिस्थितिकि विज्ञानी हिमालय द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप को दी जाने वाली पारिस्थितिकी सेवाओं को तीन भागों में बांटते हैं.


सर्व प्रथम आपूर्तिकर्ता के रूप में:

इसके तहत गंगा-यमुना, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र नदियों के मैदानी क्षेत्रों को जल एवं उपजाऊ मृदा की आपूर्ति होती है. इस कारण इस क्षेत्र की उर्वरता और जल उपलब्धता के कारण इसे सर्वाधिक उपयोगी क्षेत्रों में से एक बनाती है.


दूसरी भूमिका नियंत्रक के रूप में:


इसके तहत भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून और सम्पूर्ण जलवायु के रूप में हिमालय की भूमिका को रख सकते हैं.


और तीसरी इसकी बहु-उपयोगी जैविविधता:

हिमालय के कारण प्राकृतिक रूप से इस उपमहाद्वीप की कुल जैव विविधता का संरक्षण भी इसकी महत्वपूर्ण पारिस्थितिक सेवा है.


हालांकि कवियों ने हिमालय को अटलता, दृढ़ता का प्रतीक माना है लेकिन वास्तविकता यह है कि हिमालय अत्यंत भंगुर श्रेणिया है. ये विश्व की सर्वाधिक शैशव श्रेणिया हैं. इनके बनने की प्रक्रिया अभी भी बदस्तूर जारी है. इसी कारण यहां भूगर्भीय हलचलें होती रहती हैं और लगातार छोटे बड़े भूकंप आते रहते हैं.


भूकम्पों के अलावा भूस्खलन, हिमालय की नदियों में आने वाली अचानक बाढें, अतिवृष्टि जनित आपदाएं, वनाग्नि और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं हिमालय क्षेत्र को विश्व के चंद सर्वाधिक प्राकृतिक आपदाओं वाले क्षेत्रों में शुमार करती हैं.


हिमालय और इसकी तलहटी के क्षेत्रों में सर्वाधिक नुकसान यहाँ समय समय पर आये भयानक भूकम्पों के कारण हुआ है. इनमें सन् 1505, 1828,1885, 2005 तथा 2015 के कश्मीर भूकंप, 1905, 1975 के हिमाचल भूकंप, 1803, 1916, 1991, 1999 के उत्तराखंड भूकंप, 1897, 1932, 1950, के उत्तरपूर्व भूकंप, 1934, 2015 के बिहार तथा नेपाल भूकंप.. विनाशकारी भूकम्पों की श्रृंखला की बानगी भर हैं.


भूकम्पों के सम्बन्ध में यहाँ यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि पिछले दो ढाई सौ सालों में हिमालय में कश्मीर से लेकर असम तक हर जगह बड़े भूकंप आ चुके हैं जिनमे 1905 का कांगड़ा भूकंप, 1934 का नेपाल बिहार सीमा का भूकंप और 1950 का आसाम भूकंप प्रमुख हैं जो कि रिक्टर स्केल पर 8 या उससे अधिक विराटता के थे.


हिमालय का उत्तराखंड वाला क़रीब सात सौ किमी वाला क्षैतिज क्षेत्र ऐसा है जहां अभी तक ज्ञात इतिहास में इतना बड़ा भूकंप नहीं आया है. लगभग सभी भूकंप विज्ञानी मानते हैं कि हिमालय में अगला 8+ तीव्रता का भूकंप का क्षेत्र उत्तराखंड ही होगा. विशाल भूकम्पों से अभी तक निरापद इस क्षेत्र को भूकंप विज्ञानी मध्य भूकंपीय नीरवता यानि कि सेन्ट्रल सिस्मिक गैप वाला क्षेत्र मानते हैं.


भूकम्पों के अतिरिक्त दूसरी बड़ी समस्या जिससे हिमालय जूझ रहा है वह है मौसम परिवर्तन जनित प्रभाव. वैज्ञानिकों का कहना है कि विश्व का तापमान लगातार बढ़ रहा है और तापमान बढ़ने की यह गति अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा हिमालय में सर्वाधिक है. इसका सीधा मतलब है कि हिमालय के ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना. ग्लेशियरों के पिघलने की गति ख़तरनाक हद तक पहुच गयी है और कुछ वैज्ञानिक तो कुछ दशकों में हिमालय के अधिकाँश ग्लेशियरों का अस्तित्व समाप्त होने की भविष्यवाणी भी कर चुके हैं.

इसका सीधा सम्बन्ध यहाँ से निकलने वाली नदियों के अस्तित्व पर तो तत्काल पडेगा ही, इसके अतिरिक्त इससे अन्य मौसमी प्रभाव जो अनुभव किए जा रहे हैं, उनमें अतिवृष्टि की घटनाएं बढना, वर्षा के वितरण में उल्लेखनीय बदलाव, और नदियों में गाद की मात्रा में वृद्धि शामिल है. विशेषज्ञ मानते हैं कि मौसम में आ रहे इस बदलाव के कारण हिमालय की कई दुर्लभ वनस्पतियां और जंतु विलुप्त हो जायेंगे. केदारनाथ त्रासदी जैसी अतिवृष्टि जनित आपदाएं बढेंगी, नदियों का व्यवहार असामान्य होता चला जाएगा.


उपरोक्त वर्णित प्रभाव या तो प्राकृतिक हैं या फिर वैश्विक स्तर पर मानवकृत क्रिया कलापों के परिणाम हैं. परन्तु हिमालय पर मानवकृत हस्तक्षेप से चुनोतियां कई गुना गंभीर हो गयी हैं. अंधाधुंध बांधों का निर्माण, बड़े स्तर पर वनों का कटान, सड़कों का निर्माण और नदी मार्गों पर बस्तियाँ बसाना ये कुछ ऐसे क्रिया कलाप हैं, जिनसे हमने ख़ुद को बारूद के ढेर पर खडा कर दिया है. बांधों से नदी पारिस्थितिक तंत्र की अविरलता तो बुरी तरह से प्रभावित होती ही है, इनसे हिमालय का मैदान से पारिस्थितिक सेवा वाला रिश्ता भी असम्बद्ध हो जाता है.


हम यह भूल जाते हैं कि हिमालय की नदियां केवल पानी ही नहीं बहाती हैं, बल्कि वे हिमालय से बहुमूल्य मिट्टी भी बहाती हैं जो मैदानों की उर्वरता को अक्षुण बनाए रखती है. बांधों से मिट्टी का बहाव रुक जाता है जो कालान्तर में विनाश्कारी साबित होगा. इसके अतिरिक्त नदी के जीवों का गमन बाधित हो जाता है.


मछलियाँ प्राकृतिक चक्र में प्रजनन के लिए ऊपरी क्षेत्रों में जाती हैं लेकिन बाधों से उनकी आवाजाही ठप्प हो जाती है. यही नहीं कई वन्यजीवों का ऊपरी क्षेत्रों में नदी के दोनों तरफ़ आवागमन बुरी तरह से प्रभावित होता है. फलतः कई प्रजातियाँ नष्ट हो रही हैं. वैज्ञानिक मानते हैं कि टिहरी सरीख़े बड़े जलाशय भूकम्पों को उत्प्रेरित करने में भी सहायक होते हैं.


उत्तराखंड राज्य गठित होने के बाद बांधों की संख्या में तो बाढ़ आयी ही, इसके अतिरिक्त अंधाधुंध सडकों के निर्माण ने भी एक बिल्कुल नयी समस्या खड़ी कर दी. सन् 2000 में राज्य गठन से पहले उत्तराखंड में सिर्फ 8 हज़ार किमी सड़कें थी आज ये लम्बाई क़रीब तीस हज़ार किमी पार कर गयी है.


पहाड़ों में एक किमी सड़क बनाने में 20 से 60 हज़ार घन मीटर मलवा पैदा होता है. इस तरह से देखें तो केवल सड़क निर्माण से अभी तक हम लगभग एक अरब घन मीटर मलवा पहाड़ी ढलानों पर डाल चुके हैं, जिससे पहाड़ों की वनस्पतियों का भारी नुक़सान हुआ है. नदियों में मलवे की मात्रा में कई गुना वृद्धि हो गयी जिससे नदियों के सैलाव की घटनाओं में अचानक तेज़ी आ गयी है. भूस्खलन की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं. और तेजी से ख़त्म हो रही खेती को कई गुना अधिक नुक़सान हुआ है.


हिमालय की चुनौतियों का वर्णन एक लेख में समेटना असंभव है. लेकिन फिर भी हमने कोशिश की है कि ख़तरे कि एक बानगी यहां दिखाई जाय. इन्हीं ख़तरों के चलते हिमालय दिवस मनाने की प्रासंगिकता बनती है. ज़रूरत है आज के दिन में हम अपने विकास के मॉडलों पर पुनर्विचार करें. अन्यथा आप ही बताएं प्रतिज्ञा, उत्सव भाषणों में सिमटी इस रश्म अदायगी से कुछ होने वाला है क्या?


डॉ. एस पी सती, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के

डिपार्टमेंट ऑफ़ जियोलॉजी में प्रोफ़ेसर हैं.

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