नौकरियों के वादे का अर्थशास्त्र क्या है?

2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत के पीछे भी एक बड़ा कारण प्रधानमंत्री पद के तत्कालीन उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का हर साल दो करोड़ नौकरी देने का वादा था. लेकिन मोदी और तेजस्वी यादव और अब राहुल गांधी के वादे में एक महत्त्वपूर्ण फ़र्क़ है. मोदी ने नौकरी के प्रकार को अस्पष्ट रखा था. जबकि आरजेडी और कांग्रेस ने सरकारी नौकरी का स्पष्ट उल्लेख किया है. इसलिए ये बहस का विषय है कि ऐसी नौकरी के वादे के ज़रिए बेरोजगारों को लुभाने की आरजेडी और कांग्रेस की रणनीति में कितना दम है?

- सत्येंद्र रंजन

कांग्रेस ने असम में चुनाव जीतने पर पांच लाख लोगों को सरकारी नौकरी देने का वादा किया है. इस वादे का क्या असर होगा, यह चुनाव नतीजे के एलान के बाद ही पता चलेगा. लेकिन पांच महीने पहले बिहार में हुए विधानसभा चुनाव के अनुभव पर गौर करें, तो वहां राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव का ऐसा वादा क़ाफ़ी हद तक कारगर रहा था.


तेजस्वी यादव का वादा था कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी, तो वे बतौर मुख्यमंत्री जिस पहले फैसले पर दस्तख़त करेंगे, वह दस लाख नौजवानों को सरकारी नौकरी देने का होगा. इस वादे का जबरदस्त असर हुआ. जिस चुनाव को शुरुआत में बीजेपी- जेडी (यू) के पक्ष में एकतरफा समझा जा रहा था, उसे तेजस्वी यादव के इस वादे ने कांटे की टक्कर का बना दिया.


तेजस्वी यादव की सभाओं में नौजवानों की उमड़ती भीड़ ने इस बात की तस्दीक की थी कि आज नौकरी के वायदे कि कितनी अहमियत है.


देश में रोजगार का सवाल- या कहें बेरोजगारी की समस्या- अति गंभीर रूप में है. ताज़ा अनुमानों के मुताबिक़ युवा बेरोजगारी की दर 20 फीसदी से अधिक हो चुकी है. हालात पहले से भी बेहतर नहीं थे, लेकिन कोरोना महामारी के दौरान अनियोजित लॉकडाउन के फैसले ने हालत को बेहद डरावना बना दिया है. वैसे में नौकरी देने के राजनीतिक वादे से खास कर युवा मतदाता अगर किसी पार्टी या नेता की तरफ आकर्षित होते हों, तो यह स्वाभाविक ही है.


असल में 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की बड़ी जीत के पीछे भी एक बड़ा कारण प्रधानमंत्री पद के तत्कालीन उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का हर साल दो करोड़ नौकरी देने का वादा था. लेकिन मोदी और तेजस्वी यादव और अब राहुल गांधी के वादे में एक महत्त्वपूर्ण फ़र्क़ है. मोदी ने नौकरी के प्रकार को अस्पष्ट रखा था. जबकि आरजेडी और कांग्रेस ने सरकारी नौकरी का स्पष्ट उल्लेख किया है.


इसलिए ये बहस का विषय है कि ऐसी नौकरी के वादे के ज़रिए बेरोजगारों को लुभाने की आरजेडी और कांग्रेस की रणनीति में कितना दम है? क्या इस वादे के पीछे उनकी कोई सुविचारित- विस्तृत योजना है, या फिर उन्होंने महज ‘चुनावी वादे’ के बतौर इसे अपने चुनाव घोषणापत्र में शामिल कर दिया है?


इससे पहले कि बात आगे बढ़ाई जाए, आज के मीडिया माहौल को देखते हुए यहां एक स्पष्टीकरण ज़रूरी है. आज का मीडिया माहौल सत्ताधारी दल का अंध-समर्थन और विपक्ष की पल-पल और कदम-दर-कदम पड़ताल करने का है. चूंकि हम यहां सवाल कांग्रेस और आरजेडी से कर रहे हैं, तो इसे भी उसी माहौल का हिस्सा समझा जा सकता है, क्योंकि इस लेख में बीजेपी के वादों की पड़ताल नहीं है. लेकिन ऐसा करने के पीछे ये समझ है कि बीजेपी के रोजगार या विकास के वायदे असल में पड़ताल करने योग्य नहीं हैं.


अब यह साफ़ हो चुका कि उनके पीछे कोई सुविचारित योजना नहीं है. साथ ही अब ये पार्टी अपने राजनीतिक बहुमत के लिए ऐसे वादों पर निर्भर भी नहीं है. उसका प्रमुख राजनीतिक हथियार सामाजिक पूर्वाग्रहों और द्वेष के आधार पर किया गया ध्रुवीकरण है.


इसके जरिए बीजेपी परंपरागत सामाजिक वर्चस्वों को फिर से भारतीय समाज में मजबूत करने में फिलहाल क़ामयाब रही है. दरअसल, यह पार्टी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में और भारतीय संविधान के लागू होने के बाद हुई सामाजिक- आर्थिक प्रगति का निषेध है.


इसलिए इससे सकारात्मक बहस की कोई गुंजाइश नहीं बचती. दरअसल, इस पार्टी का बुनियादी चरित्र आरंभ से ऐसा ही रहा है. इसलिए आर्थिक मुद्दों पर उससे संवाद करना अप्रसांगिक है.


कांग्रेस, आरजेडी या गैर भाजपा दूसरे दलों की प्रासंगिकता आर्थिक- सामाजिक प्रगति के लिए उनके योगदान के रिकॉर्ड पर रही है. इसलिए ऐसे दल जब कोई ध्यान खींचने वाला वादा करते हैं, तो उस वादे की जरूर पूरी पड़ताल की जानी चाहिए. फिलहाल, मुद्दा सरकारी नौकरियों के वादे का है.


तो (असम में) कांग्रेस और (बिहार में) आरजेडी से यह अवश्य पूछा जाना चाहिए कि आखिर (चुनाव जीतने पर) कैबिनेट की पहली बैठक में नौकरियां देने के वादे से देश में लगातार भीषण हो रही बेरोजगारी की समस्या का समाधान कैसे निकलेगा? हम यहां यह मान कर चल रहे हैं कि तेजस्वी अगर जीत गए होते, तो दस लाख सरकारी नौकरियां देने की प्रक्रिया वे शुरू कर देते.


या असम में अगर कांग्रेस जीती, तो उसकी सरकार पांच लाख सरकारी नौकरियां दे देगी. तेजस्वी ने कहा था कि गुजरे वर्षों के दौरान बिहार में दस लाख पद खाली हैं, जिन पर भर्ती नहीं हुई है. हम बिना ज्यादा पड़ताल किए मान लेते हैं कि असम में भी पांच लाख सरकारी पद खाली होंगे, जिन्हें भरने में कोई तकनीकी रुकावट नहीं है.

मगर इन दोनों वादों से यह साफ है कि नौकरियां देने का यह वन टाइम यानी एक बार का कदम होगा। लेकिन जो लोग इस संख्या से बाहर रह जाएंगे, कांग्रेस या आरजेडी के पास उनके लिए क्या योजना है? और फिर जिस देश में लगभग सवा करोड़ युवा हर साल श्रम बाजार में प्रवेश करते हों, वहां एक बार नौकरी दे देने के कदम से आखिर खुशहाली का सपना कैसे साकार हो सकता है? इसीलिए इस लेख का विषय यह है कि सरकारी नौकरियों के वादे का अर्थशास्त्र क्या है?


देश में आजादी के बाद ऐसा अर्थशास्त्र अपनाया गया था। उससे एक ऐसा आर्थिक ढांचा बना, जिससे एक बेहद गरीब देश में एक बड़ा मध्य वर्ग उभर पाया. इसके अलावा उस कारण गरीब और पिछड़े तबकों का जीवन स्तर भी पहले से ऊंचा उठाने में मदद मिली.


योजनाबद्ध विकास और विकास नीति में पब्लिक सेक्टर को केंद्रीय भूमिका देना उस अर्थशास्त्र का सार था. बाकी उपलब्धियों को फिलहाल छोड़ दें, तो उस अर्थव्यवस्था का यह परिणाम ही कम चमत्कृत करने वाला नहीं है कि भारत में जीवन प्रत्याशा 1947 के लगभग 33 साल से बढ़ कर अब तक लगभग 70 साल के करीब पहुंच गई है.


1991 में सोवियत संघ के विखंडन के बाद नव-उदारवादी विचारधारा और उसके संचालकों की हुई फौरी जीत के बाद भारत ने भी उपरोक्त अर्थव्यवस्था से अलग दिशा तय की थी. वो दिशा अपनी पराकाष्ठा पर 2014 में योजना आयोग को भंग किए जाने के साथ पहुंची. उसके बाद जिस तरह के सांप्रदायिक- क्रोनी राजनीतिक अर्थव्यवस्था (पॉलिटिकल इकॉनमी) देश पर हावी हुई है, वह हम सबके सामने है.


बहरहाल, 2008-09 की आर्थिक मंदी और कोरोना महामारी के बाद नव-उदारवाद के मुख्य गढ़ देशों में भी इस विचारधारा को न सिर्फ चुनौती मिली है, बल्कि अब वहां की सरकारें अपनी साख बरकरार रखने के लिए उस नुस्खे का खुद उल्लंघन कर रही हैं, जिसे उन्होंने दुनिया भर पर थोपा था. उसकी सबसे ताजा मिसाल जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका में 1.9 ट्रिलियन का दिया गया कोरोना राहत पैकेज है.