हमारी आज़ादी का क्या मक़सद है?

गुजरात के तत्कालीन CM नरेंद्र मोदी पर गुजरात दंगों को भड़काने के आरोप लगाने वाले पूर्व आईपीएस ऑफिसर संजीव भट्ट, जिन्हें हाल ही में आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गयी है, ने हिंन्दुस्तान के नागरिकों को संबोधित एक पत्र में कुछ सवाल उठाये हैं. इन सवालों पर निगाह डालना जरूरी है...




क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं?
क्या आज़ादी का सही मतलब उपनिवेशिक कीड़ों को देश से बहार भागना था?
क्या आज़ादी का मतलब इससे नहीं था कि हमें सवाल करने का अधिकार, सरकार को चुनौती देने का अधिकार, अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार और संसोधन का अधिकार मिले?

संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता संजीव भट्ट ने गुरुवार को अपने पति की फ़ेसबुक वॉल में, देशवासियों के नाम जेल से लिखा उनका पत्र शेयर किया है. लम्बे समय से बर्खास्त चल रहे आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट, उनकी कस्टडी में हुई एक आरोपी की मौत के मामले में पालनपुर जेल गुजरात में सज़ा काट हैं. यहीं से उन्होंने ने ये पत्र लिखा है. कई लोगों की यह राय है कि असल में वह देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने के चलते सज़ा काट रहे हैं.


अपने पत्र में उन्होंने लिखा है कि वह 'अन्धकार के अंतस' (Heart of Darkness) से यह पत्र लिख रहे हैं. इस पत्र में उन्होंने हिंदुस्तान की आज़ादी के अवसर पर आज़ादी के बारे में अपने विचार व्यक्त किये हैं।


वह लिखते हैं कि आज 'राष्ट्रवाद का विचार अल्पसंख्यकों के बहिष्कार पर आधारित है' और उन्होंने ऐसी राजनीति को 'ठगों की पसंद' करार दिया है।


भट्ट लिखते हैं, ''आज के समय में उपद्रवी राष्ट्रवाद और भीड़तंत्र जोकि राज्य के पनाह में पनप रहा है, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक असंतोष के सभी स्वरों को जबरन चुप करा रहा है.''

उनका पत्र स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में अधिकारी नाराज़ है। उनका कहना है कि मौजूदा राजनीतिक कथनों और बयानबाजी ने न केवल हमारी क्षमता को धूमिल किया है, बल्कि हमें अच्छाई और बुराई के बीच अंतर करने की हमारी क्षमता से भी वंचित किया है।


वह पत्र में लिखते हैं, ''हम अभूतपूर्व अंधकार की दहलीज पर हैं.''


भारत के नागरिकों से आग्रह करते हुए, भट्ट कहते हैं कि यदि देश को एक सटीक लोकतंत्र के रूप में जीवित रहना है, तो हर एक व्यक्ति को भीड़ से ऊपर उठना होगा, अपनी राय को ज़ाहिर करना होगा और उपद्रवी राष्ट्रवाद को 'नेस्तेनाबूत' करना होगा.


संजीव के पत्र के तीन पन्नों को उनकी पत्नी द्वारा साझा किए जाने के बाद से सोशल मीडिया पर इसे व्यापक प्रतिक्रिया मिली है. कई लोग उनके विचारों के समर्थन में आए हैं और एक बेहतर भारत की उम्मीद जता रहे हैं जो कि असल अर्थों में आज़ाद हो.


संजीव ने पत्र में यह भी लिखा है कि लोगों को यह महसूस करना होगा कि सरकार राष्ट्र नहीं है, और सरकार विरोधी होना राष्ट्र-विरोधी होना नहीं होता. संजीव ने अपने पत्र के आख़िर में मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की एक नज़्म भी साझा की है.