'बाबरी मस्ज़िद—राम मंदिर विवाद' पर नेहरू क्या कहते?

'बाबरी मस्ज़िद—राम जन्मभूमि विवाद' पर शनिवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की कई तरह से व्याख्याएं की जा रही हैं. ऐसे में इस तरह के विवादों पर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की क्या राय होती, इसे समझने के अपने मायने हैं. यहां 'दो मस्ज़िदें' शीर्षक का नेहरू का एक संस्मरणात्मक आलेख दिया जा रहा है, जिसमें पेश उद्धरणों और नज़रिए ​में ऐसे सूत्र हैं, जो 'बाबरी मस्ज़िद—राम जन्मभूमि विवाद' पर भी नेहरू की संभावित राय जाहिर करते हैं.  (-संपादक) 

- दो ​मस्ज़िदें -


- जवाहर लाल नेहरु


आजकल अख़बारों में लाहौर की शहीदगंज मस्ज़िद की प्रतिदिन कुछ न कुछ चर्चा होती है. शहर में क़ाफ़ी ख़लबली मची हुई है. दोनों तरफ़ मजहबी जोश दिखता है. एक दूसरे पर हमले होते हैं, एक दूसरे की बदनीयती की शिकायतें होती हैं और बीच में एक पंच की तरह अंग्रेज़ हुकूमत अपनी ताक़त दिखलाती है. मुझे न तो बाकयात ही ठीक ठीक मालूम है कि किसने पहले यह सिलसिला पहले छेड़ा था, या किसकी ग़लती थी, और न इसकी जांच करने की ही मेरी कोई इच्छा है. इस तरह के धार्मिक जोश से मुझे बहुत दिलचस्पी भी नहीं है. लेकिन दिलचस्पी हो या ना हो वह दुर्भाग्य से पैदा हो जाए, तो उसका सामना करना ही पड़ता है. मैं सोचता था कि हम लोग इस देश में कितने पिछड़े हुए हैं कि अदना अदना सी बातों पर जान देने को उतारू हो जाते हैं, पर अपनी गुलामी और फ़ाक़ेमस्ती सहने की तैयार रहते हैं.


इस मस्ज़िद से मेरा ध्यान भटककर एक दूसरी मस्ज़िद की तरफ़ जा पहुंचा. वह एक बहुत प्रसिद्ध ऐतिहासिक मस्ज़िद है और क़रीब चौदह सौ वर्ष से उसकी तरफ़ लाखों करोड़ों निगाहें देखती आई हैं. वह इस्लाम से भी पुरानी है और उसने अपनी इस लंबी ज़िंदगी में न जाने कितनी बातें देखीं. उसके सामने बड़े बड़े साम्राज्य गिरे, पूरानी सल्तनतों का नाश हुआ धार्मिक परिवर्तन हुए. ख़ामोशी से उसने यह सब देखा और हर क्रांति और तबादले पर उसने अपनी भी पोशाक बदली. चौदह सौ वर्ष के तूफ़ानों को इस आलीशान इमारत ने बर्दाश्त किया, बारिश ने उसको धोया, हवा ने अपने बाजुओं से उसको रगड़ा, मिट्टी ने उसके बाज हिस्सों को ढका. बुजुर्गी और शान उसके एक एक पत्थर से टपकती है. मालूम होता है, उसकी रग रग और रेशे रेशे में दुनिया भर का तजुरबा इस डेढ़ हज़ार वष ने भर दिया है. इतने लंबे ज़माने तक प्रकृति के खेलों और तूफ़ानों को बर्दाश्त करना कठिन था, लेकिन उससे भी अधिक कठिन था मनुष्यों की हिमाक़तों और वहशतों को सहना. पर उसने यह सहा. उसके पत्थरों की ख़ामोश निगाहों के सामने साम्राज्य खड़े हुए और गिरे, मजहब उठे और बैठे, बड़े से बड़े बादशाह, ख़ूबसूरत औरतें, लायक से लायक आदमी चमके और फिर अपना रास्ता नापकर ग़ायब हो गए. हर तरह की वीरता उन पत्थरों ने देखी और देखी हर प्रकार की नीचता और क़मीनापन. बड़े और छोटे, अच्छे और बुरे सब आए और चल बसे, लेकिन वे पत्थर अभी क़ायम हैं. क्या सोचते होंगे वे पत्थर, जब वे आज भी अपनी ऊँचाई से मनुष्यों की भीड़ों को देखते होंगे— उनके बच्चों का खेल, उनके बड़ों की लड़ाई, फ़रेब और बेवकूफ़ी? हज़ारों वर्षों में इन्होंने कितना कम सीखा! कितने दिन और लगेंगे कि इनको अक्ल और समझ आए?


समद्र की एक पतली सी बांह एशिया और यूरोप को वहां अलग करती है. एक चौड़ी नदी की भांति बासफ़ोरस बहता है और दो दुनियाओं को ​ज़ुदा करता है. उसके यूरोपियन किनारे की छोटी छोटी पहाड़ियों पर बाइजेंटियम की पुरानी बस्ती थी. बहुत दिनों से वह रोमन साम्राज्य में थी,​ जिसकी पूर्वी सरहद ईसा की शुरू की शताब्दियों में ईराक तक थी, लेकिन पूरब की ओर से इस साम्राज्य पर अक्सर हमले होते थे. राम की शुक्ति कुछ कम हो रही थी, और वह अपनी दूर—दूर की सरहदों की ठीक तरह रक्षा नहीं कर सकता था. कभी पश्चिम और उत्तर में जर्मन वहशी— जैसा कि रोमन लोग उन्हें कहते थे— चढ़ जाते थे और उनका हटाना मुश्किल हो जाता तो कभी पूरब में ईराक़ की तरफ़ से या अरब से एशियाई लोग हमले करते और रोमन फ़ौजों को हरा देते थे.


रोम के सम्राट कांस्टेंटाइन ने यह फ़ैसला किया कि अपनी राजधानी पूरब की ओर ले जाए, ताकि वह पूर्वी हमलों से साम्राज्य की रक्षा कर सके. उसने बासफोरस के सुंदर तट को चुना और बाइजेंटियम की छोटी पहाड़ियों पर एक विशाल नगर की स्थापना की. ईसा की चौथी सदी ख़त्म होने वाली थी, जब कांस्टेटिनोपल (उर्फ़ कुस्तुंतुनिया) का जन्म हुआ.


इस नवीन व्यवस्था से रोमन साम्राज्य पूरब में जाकर मजबूत हो गया, लेकिन अब पश्चिमी सरहद और भी दूर पड़ गई. कुछ दिन बाद रोमन साम्राज्य के दो टुकड़े हो गए— एक पश्चिमी साम्राज्य और दूसरा पूर्वी साम्राज्या. कुछ वर्ष बाद पश्चिमी साम्राज्य को उसके दुश्मनों ने ख़त्म कर दिया, लेकिन पूर्वी साम्राज्य एक हज़ार वर्ष से अधिक और क़ायम रहा और बाइजेंटान साम्राज्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ.


सम्राट कॉंस्टेंटाइन ने केवल राजधानी ही नहीं बदली, बल्कि उससे भी बड़ा एक परिवर्तन किया. उसने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया. उसके पहले ​ईसाईयों पर रोम में बहुत सख़्तियां थीं. उनमें से जो रोम के देवताओं को नहीं पूजता था या सम्राट की मूर्ति का पूजन नहीं करता था उसको मौत की सज़ा मिल सकती थी. अक़्सर उसे मैदान में भूखे शेरों के सामने फेंक दिया जाता था. यह रोम की जनता का एक बहुत प्रिय तमाशा था. रोम में ईसाई होना एक बहुत ख़तरे की बात थी. वे बाग़ी समझे जाते थे. अब एकाएक ज़मीन आसमान का फ़र्क हो गया. सम्राट स्वयं ईसाई हो गया और ईसाई धर्म सबसे अधिक आदरणीय समझा जाने लगा. अब पुराने देवताओं को पूजने वाले बेचारे मुश्क़िल में पड़ गए और बाद के सम्राटों ने तो उनको बहुत सताया. केवल एक सम्राट (जूलियन) फिर ऐसे हुए जो ईसाई धर्म को तिलांजलि देकर फिर देवताओं के उपासक बन गए. परन्तु अब ईसाई धर्म बहुत ज़ोर पकड़ चुका था. इसलिए बेचारे रोम और ग्रीस के प्राचीन देवताओं को जंगल की शरण लेनी पड़ी और वहां से भी धीरे धीरे ग़ायब हो गए. इस पूर्वी रोमन साम्राज्य के केंद्र कुस्तुंतुनियां में सम्राटों की आज्ञा से बड़ी—बड़ी इमारतें बनीं और बहुत जल्द ही वह एक विशाल नगर हो गया. उ