कविता: जहां मन हो भय से मुक्त

रविंद्रनाथ टैगोर की यह कविता एक सबसे ख़ूबसूरत संभावित दुनिया का सपना है.. यह यूटोपिया नहीं एक सपना है.. खुली आंखों का सपना.. परिपक्व आंखों का सपना.. सिद्ध आंखों का सपना..

-रविंद्रनाथ टैगोर

हिंदी अनु.- रोहित जोशी



जहां, मन हो भय से मुक्त और सिर फ़क्र से ऊँचा. जहां ज्ञान हो आज़ाद.

जहां, दुनिया न हो टूटी-बिखरी संकीर्ण घटिया दीवारों के ज़रिए..

जहां, सच की गहराई से निकलकर बाहर उतरें शब्द.

जहां, कोशिशें बिना थके फ़ैलाए अपनी बाहें, सबसे बेहतरीन को पाने.

जहां, रूढ़ आदतों की मरूस्थली रेत में वजहों को तलाशती निर्मल धाराएं ना भटक गई हों अपनी राह.

जहां, (मैं से उबर कर) 'आप' को पाने निरंतर विस्तार पाते विचारों और कर्मों की ओर मन बढ़ता हो आगे.

मेरे परमेश्वर! मेरे देश को जाग्रत करें स्वतंत्रता के स्वर्ग की ओर..

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Where the mind is without fear and the head is held high

Where knowledge is free

Where the world has not been broken up into fragments by narrow domestic walls

Where words come out from the depth of truth

Where tireless striving stretches its arms towards perfection

Where the clear stream of reason has not lost its way into the dreary desert sand of dead habit

Where the mind is led forward by thee into ever-widening thought and action

Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.

-Ravindra Nath Tagore

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