देश को कहॉं ले जाएगा मोदी का ‘न्यू वेल्फ़ेयरिज़्म’?

ज़ाहिर है, न्यू वेल्फ़ेयरिज़्म से वोट मिलते हैं. लेकिन ये सियासी कामयाबी देश में सामाजिक सुरक्षा के तंत्र के कमज़ोर होने और दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी निवेश के धीरे-धीरे ख़त्म होते जाने की शर्त पर होता है.

- सत्येंद्र रंजन

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पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS- 5) के आंकड़े पिछले दिसंबर में जारी हुए, तो उनसे एक बेहद चिंताजनक तथ्य सामने आया. 2015 से 2019 के बीच दशकों में ऐसा पहली बार ऐसा हुआ कि देश में शारीरिक रूप से अविकसित बच्चों की संख्या बढ़ गई.


यानी सरल भाषा में कहें तो इसका मतलब है कि बाल कुपोषण बढ़ गया.


ये ट्रेंड, 17 में से 11 राज्यों में देखा गया (जिन राज्यों में ये सर्वे हुआ). जिन राज्यों में ये हालत बिगड़ी, उनमें महाराष्ट्र, गुजरात, और केरल जैसे राज्य भी हैं, जिन्हें आम तौर पर अधिक विकसित माना जाता है.

ये स्थिति क्यों हुई? केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के पूर्व प्रमुख आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने अपने एक विश्लेषण में इसके लिए मोदी सरकार की ‘न्यू वेल्फ़ेयरिज़्म’ नीति को ज़िम्मेदार ठहराया. ये नीति बिल्कुल नई है या नहीं, यह बहस का विषय है. लेकिन ये नीति देश को कहां ले जा रही है, अब इसमें कोई शक नहीं बचा है.


‘न्यू वेल्फ़ेयरिज़्म’

तो आखिर क्या है ये ‘न्यू वेल्फ़ेयरिज़्म’ की नीति?


अरविंद सुब्रह्मण्यम के मुताबिक पुनर्वितरण (redistribution) और समावेशन (inclusion) के प्रति यह एक बिल्कुल ख़ास नज़रिया है. इसके तहत बुनियादी स्वास्थ्य और प्राथमिक शिक्षा जैसे सार्वजनिक कल्याण के क्षेत्रों को अहमियत नहीं दी जाती, जैसा कि पहले किया जाता था.


इसी तरह सामाजिक सुरक्षा के तंत्र को मजबूत करने में सरकार दिलचस्पी नहीं लेती. इसके बदले इसमें वस्तुओं और सेवाओं को सीधे लाभार्थी को दे दिया जाता है. मसलन, पहले जो सब्सिडी कृषि इनपुट के उत्पादन के लिए दी जाती थी, वह अब सीधे किसानों के बैंक खाते में डाल दी जाती है. इसी तरह रसोई गैस, बिजली, मकान, शौचालय आदि लोगों को सीधे उपलब्ध करवाए जाते हैं.

सुब्रह्मण्यम ने लिखा- न्यू वेल्फ़ेयरिज़्म के पीछे गणना यह है कि मतदाताओं को सीधे वस्तु या सेवाएं देने से उच्च राजनीतिक लाभ प्राप्त होता है. इसके तहत मिला लाभ सामने होता है, जिसे लोग देख सकते हैं.


प्राथमिक शिक्षा जैसी जो सेवाएं सरकारें परंपरागत रूप से देती थीं, वह साकार रूप में व्यक्ति के सामने मौजूद नहीं दिखती थीं. उन्हें परिभाषित करना और उन्हें मापना आसान नहीं था. लेकिन अगर सरकार शौचालय देने का वादा कर रही है, तो उसे आप देख सकते हैं कि वह बन रहा है या नहीं.


सुब्रह्मण्यम ने कहा कि ये नया वेल्फ़ेयरिज़्म एक साथ दक्षिणपंथ की अस्मिता की राजनीति को संतुलित करता है, मध्य मार्ग के बाज़ार सुधार को गले लगाता दिखता है, और वामपंथ की पुनर्वितरण (redistributive) अर्थव्यवस्था का नुमाइंदा बना दिखता है.


मोदी सरकार और ‘न्यू वेल्फ़ेयरिज़्म’

ज़ाहिर है, न्यू वेल्फ़ेयरिज़्म से वोट मिलते हैं. लेकिन ये सियासी कामयाबी देश में सामाजिक सुरक्षा के तंत्र के कमज़ोर होने और दीर्घकालिक विकास के लिए जरूरी निवेश के धीरे-धीरे ख़त्म होते जाने की शर्त पर होता है.


अगर परिवारों की अपनी आमदनी नहीं बढ़ेगी, बुनियादी स्वास्थ्य में निवेश नहीं होगा, पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (पीडीएस) को क्रमिक ढंग से ख़त्म किया जाएगा, आंगनबाड़ी जैसी योजनाएं कमज़ोर होंगी, मिड-डे मील का सिस्टम प्राथमिकता में नहीं रहेगा, तो कुपोषण बढ़ना उसका स्वाभाविक परिणाम है.


लेकिन ये मुमकिन है कि जिनके बच्चे कुपोषण से नए सिरे से ग्रस्त हुए, उनके हाथ में कोई प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ पहुंचा हो. और इसलिए ये संभव है वे उसी पार्टी को फिर से वोट दें, जिसकी नीतियों की वजह से कुपोषण बढ़ रहा है.


इसी तरह संभव है कि कृषि का पूरा तंत्र बर्बाद होने और उर्वरक एवं डीजल जैसे अहम कृषि इनपुट की लगातार महंगाई के बावजूद बहुत से किसानों को अपने खाते में पहुंची ‘सम्मान निधि’ की रक़म ज्यादा लुभावनी लगे.


बेशक, न्यू वेल्फ़ेयरिज़्म की ये नीति मोदी सरकार के दौर में सर्व-प्रमुख बन गई है. इसलिए इसके नतीजे अब और तेजी से सामने आ रहे हैं. फिर भी ये सवाल अपनी जगह प्रासंगिक है कि क्या सचमुच इस नीति के लिए पूरी तरह मोदी सरकार ही जिम्मेदार है?

पिछले तीन दशकों से देश जिस दिशा में चला और उस दौरान बुनियादी ढांचा जिस तरह सरकारों की प्राथमिकता से हटता गया, उससे वाक़िफ़ लोगों के लिए पूरी जवाबदेही मोदी सरकार पर डालना शायद संभव नहीं होगा.


पीडीएस, सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों से सरकारों के हटाने का क्रम 1991 में अपनाई गई नव-उदारवादी नीति के साथ शुरू हो गया था.

‘न्यू वेल्फ़ेयरिज़्म’ के दुष्परिणाम

‘Government has no business to be in business’ (कारोबार में दखल सरकारों का काम नहीं है) जैसे जुमले भी नरेंद्र मोदी का आविष्कार नहीं हैं. अब सिर्फ इतनी बात है कि मोदी सरकार ने ऐसे जुमलों को खुलेआम कार्यरूप देना शुरू कर दिया है. वह पहले अपनाई गई दिशा पर बेहिचक अब बेहद तेज रफ्तार से दौड़ रही है.


क्या यह हैरतअंगेज़ नहीं है कि इस नीति के दुष्परिणाम सामने होने के बावजूद भारत के पूरे सियासी फलक में इसकी ठोस आलोचना और उचित विकल्प पेश करने की कोई कोशिश होती नहीं दिखती. बल्कि प्रत्यक्ष लाभ देकर से वोट पाने का लालच ऐसा है कि उस दिशा में ही लगभग तमाम पार्टियां दौड़ती नज़र आ रही हैँ.


केरल को भारत का सबसे प्रगतिशील राज्य कहा जाता है. कभी यहां अपनाए गए विकास मॉडल की ख़ूब तारीफ़ होती थी. मशहूर अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के विमर्श में अक्सर आई ‘केरल मॉडल’ की चर्चा ने इसे दुनिया भर में चर्चित किया था.

लेकिन इस बार के विधानसभा चुनाव में दोनों प्रमुख मोर्चों- लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के चुनाव घोषणापत्रों में समाज के अलग- अलग तबकों को प्रत्यक्ष वित्तीय लाभ पहुंचाने के वायदों की होड़ लगी दिखती है.


इस ‘मॉडल’ के टिकाऊ होने पर शक जताते हुए हाल में मशहूर अर्थशास्त्री पुलापरे बालाकृष्णन ने ध्यान दिलाया कि देश में सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति सार्वजनिक क़र्ज़ केरल पर ही है. ज़ाहिर है, इन वादों को पूरा करने पर केरल के ऊपर पहले से ही चढ़े कर्ज के बोझ और बढ़ जाएगा.

बालाकृष्णन ने लिखा है- ‘वास्तविक कल्याणकारी राज्य और मौजूदा केरल मॉडल के बीच फ़र्क़ यह है कि वास्तविक कल्याणकारी में जो लाभ दिए जाते हैं, उसके लिए धन टैक्स के ज़रिए जुटाया जाता है. कल्याणकारी राज्य के ढांचे में दो बातें अहम हैं. पहला मुद्दा वित्तीय रूप से संभव होने का है. दूसरा ककल्याणकारी कार्यक्रमों को लेकर लोगों में स्वामित्व का भाव उत्पन्न करना है (यानी उन्हें लगना चाहिए कि ये कार्यक्रम खुद उनके हैं). भाव यह नहीं होना चाहिए कि कल्याणकारी राज्य ख़ैरात बांटने वाला संस्थान है, बल्कि यह होना चाहिए कि इसे ख़ुद लोगों ने अपने