कौन हो सकते हैं सुपरस्प्रेडर?

सुपरस्प्रेडर-जनों में ऐसा क्या है? किस कारण वे ढेर-सारे लोगों को संक्रमित कर देते हैं? इस विषय में कोई एक तयशुदा निष्कर्ष नहीं प्राप्त हुआ है। सुपरस्प्रेडर बनने में व्यक्ति का अपना प्रतिरक्षा-तन्त्र और विषाणु की भी सहभूमिका होती है। सुपरस्प्रेडर अधिक विषाणु-कणों को छोड़ा करते हैं , क्योंकि उनका प्रतिरक्षा-तन्त्र कमज़ोर होता है।

- डॉ. स्कन्द शुक्ल


Image courtesy: https://edition.cnn.com

संक्रमण के संसार में सभी बराबर नहीं होते। न सभी एक-से बीमार पड़ते हैं और न सभी बीमारी को एक-ही तरह से अगलों में फैलाते हैं। वर्तमान कोविड-19 के सम्बन्ध में एक शब्द को ध्यान से समझने की ज़रूरत है : सुपरस्प्रेडर। यानी समाज के ऐसे लोग जो संक्रमण के विषाणु को सामान्य की तुलना में अधिक फैलाते हैं। यानी यों तो कोई भी संक्रमित व्यक्ति अन्य स्वस्थ्य लोगों को इंफेक्शन दे सकता है किन्तु सुपरस्प्रेडर-जनों के कारण ज़्यादा लोग संक्रमित हो सकते हैं। दुनिया-भर की स्वास्थ्य-एजेंसियों से ऐसे अनेक लोगों को चिह्नित किया है, जो सुपरस्प्रेडर हैं। यानी उदाहरण के तौर पर एक व्यक्ति के कारण चार-सौ लोग संक्रमित हो गये। ध्यान रहे कि संक्रमण का इतना व्यापक प्रसार कोविड-19 का हर रोगी नहीं करता। ऐसे में महामारी की व्यापकता को समझने के लिए सुपरस्प्रेडर-जनों को चिह्नित करना ज़रूरी होता है , ताकि इन-लोगों को पहचान कर संक्रमण को और तेज़ी से फ़ैलने से रोका जा सके। हर संक्रमण में आर-ज़ीरो ( R0 ) का सिद्धान्त होता है। आर-ज़ीरो यानी किसी एक संक्रमित व्यक्ति द्वारा दूसरे स्वस्थ लोगों को सीधे संक्रमित कर सकने की संख्या। जितना अधिक आर-ज़ीरो होगा, उतना ही रोग अधिक संक्रामक समझा जाएगा। उतना ही लोग उस संक्रमण से लोग अधिकाधिक संक्रमित होंगे। उदाहरण के तौर पर मीज़ल्स ( ख़सरे ) का आर-ज़ीरो 18 के आसपास माना जाता है और मम्प्स का 15। अर्थात् मीज़ल्स का एक रोगी अपने आसपास अठारह लोगों को संक्रमित कर सकता है, जबकि मम्प्स का एक रोगी पन्द्रह लोगों को। कोविड-19 का आर-ज़ीरो 3 के आसपास माना जा रहा है, यानी एक कोविड-रोगी सीधे-सीधे तीन स्वस्थ लोगों को यह संक्रमण दे सकता है। पर आर-ज़ीरो का यह आकलन औसत आकलन है। एक सामान्य कोविड-रोगी औसतन तीन नये स्वस्थ लोगों को संक्रमित कर सकता है। पर कुछ ऐसे लोग भी हैं , जो बारह-पन्द्रह-बीस लोगों तक को संक्रमित करते पाये गये हैं। ये सुपरस्प्रेडर हैं, जो पैंडेमिक को व्यापक बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं --- ऐसा एपिडेमियोलॉजिस्टों का मानना है। सुपरस्प्रेडर-जनों में ऐसा क्या है ? किस कारण वे ढेर-सारे लोगों को संक्रमित कर देते हैं ? इस विषय में कोई एक तयशुदा निष्कर्ष नहीं प्राप्त हुआ है। सुपरस्प्रेडर बनने में व्यक्ति का अपना प्रतिरक्षा-तन्त्र और विषाणु की भी सहभूमिका होती है। सुपरस्प्रेडर अधिक विषाणु-कणों को छोड़ा करते हैं , क्योंकि उनका प्रतिरक्षा-तन्त्र कमज़ोर होता है। इनमें लक्षण कम या न-के-बराबर होते हैं , इस कारण ये अपना काम-काज समाज में जारी रखते हैं। कमज़ोर प्रतिरक्षा-तन्त्र के कारण इनकी कोशिकाओं के भीतर विषाणु ढेर सारी प्रतिलिपियाँ बना रहा होता है। सुपरस्प्रेडर किस व्यवसाय में है, यह भी संक्रमण-प्रसार में बड़ी भूमिका निभाता है। एक गृहिणी-सुपरस्प्रेडर कम लोगों को संक्रमित कर सकती है, एक डॉक्टर-सुपरस्प्रेडर ढेर सारे लोगों को एवं एक अन्तरराष्ट्रीय व्यापारी-सुपरस्प्रेडर और भी ढेर-सारे लोगों को। सुपरस्प्रेडर केवल कोविड-19 में ही होते हों , ऐसा नहीं है। अनेक संक्रमणों में इनकी पुष्टि पहले भी हो चुकी है। मोटी-मोटी बात यह है कि 20% लोग समाज में 80% रोगियों को जन्म देते हैं : सभी रोगी समाज में एक-बराबर बीमारी नहीं बाँट रहे होते। इन-सब जानकारियों के बावजूद सुपरस्प्रेडर-जनों को बहुधा यह नहीं पता होता कि वे समाज के लिए कितने ख़तरनाक हैं। सुपरस्प्रेडर बनने या होने में उनका कोई दोष नहीं है। किन्तु वे समाज के प्रति उतना उत्तदायित्व ज़रूर निभाएँ , जितना हर समझदार व्यक्ति निभा रहा है और उससे अपेक्षा की जाती है। लोगों से दूरी रखना, अकारण मिलना-मिलाना नहीं। साथ ही समाज के अन्य लोगों का दायित्व है कि वे सुपरस्प्रेडर-जनों के प्रति कोई मनोमालिन्य न रखें। #skandshukla22

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