दिल्ली के कुहासे में किसे है मजदूरों की परवाह?

पिछले साल भी प्रदूषण से निपटने के लिए रोजगार पर लगाई गई इन पाबंदियों को मजदूरों ने बड़ी ही खामोशी से सहन किया था। इस बार भी सहन कर रहे हैं। अपने घरों में पता नहीं कौन-कौन सी मुश्किलें वे झेल रहे होंगे।

- कबीर संजय



सम-विषम योजना को दिल्ली में तीसरी बार लागू किया जा रहा है। आज इसका पहला दिन है। सम-विषम यानी जिस दिन सम संख्या वाली तारीख होगी, उस दिन सम संख्या वाली कार को चलने की इजाजत होगी। जिस दिन विषम संख्या वाली तारीख होगी उस दिन विषम संख्या वाली कार को चलने की इजाजत होगी।

यानी एक प्रकार से किसी एक दिन आधी कारों के चलने पर पाबंदी लगाई गई है। इस पाबंदी से पूरा का पूरा उच्च वर्ग और मध्य वर्ग का एक हिस्सा आहत हो गया है। उसे अपने वाहन पर लगी यह पाबंदी मंजूर नहीं है। वो इसके खिलाफ अपना गुस्सा निकाल रहा है। ट्विटर पर यह ट्रेंड कर रहा है। वहां पर तमाम तरह से इसके खिलाफ भड़ास निकाली जा रही है। अरविंद केजरीवाल को गालियां दी जा रही हैं। तमाम चैनल सम-विषम की खिलाफत से भरे पड़े हैं।

तमाम विशेषज्ञ अपनी-अपनी कब्रों से बाहर निकल आए हैं। वो समझा रहे हैं कि सम-विषम जैसी योजनाएं बेकार हैं। इनसे कोई फायदा नहीं होने वाला है। ये बात और है कि यही बात वो पटाखों पर पाबंदी और पराली जलाने पर रोक के बारे में भी कहते हैं। उनके लिए प्रदूषण एक अमूर्त चीज है। जिससे लड़ा भी अमूर्त तरीके से जाएगा। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और सांसद इतने ज्यादा आहत हो गए कि खुलेआम नियम तोड़ने के लिए अपना वाहन लेकर ही निकल पड़े।

लेकिन, यहां पर मैं कहना एक दूसरी बात चाहता हूं। प्रदूषण की खतरनाक हालत को देखते हुए पूरे दिल्ली एनसीआर में पांच नवंबर तक निर्माण कार्यों पर रोक लगाई गई है। यानी नियमतः पांच नवंबर तक कोई भी निर्माण कार्य नहीं होना चाहिए। एक तसला भी नहीं उठना चाहिए। एक फावड़ा भी नहीं चलना चाहिए।

दिल्ली-एनसीआर के पूरे हिस्से में मोटा-मोटी बीस लाख से ज्यादा कंस्ट्रक्शन मजदूर हैं। वे कई बार बीस-बीस किलोमीटर दूर से साइकिल चलाकर शहरों के लेबर चौक पर मजदूरी मांगने पहुंचते हैं। यहां पर वो जानवरों की तरह खड़े रहते हैं। जहां पर काम कराने वाला आता है और सबसे मोटे-तगड़े मजदूर से उसकी मजदूरी के लिए मोलभाव करता है। आम दिनों में बहुत सारे मजदूरों को काम मिल जाता है। लेकिन, बहुत सारे बदनसीब ऐसे भी होते हैं जिन्हें काम नहीं मिलता। वे अपना मुंह लटकाकर दस-ग्यारह बजने तक सड़क के किनारे या लेबर चौराहे पर खड़े रहते हैं और ऐसे ही हताश होकर घर लौट जाते हैं।

उस दिन शायद उनके यहां चूल्हा नहीं जलता होगा। या फिर उन्हें चूल्हा जलाने के लिए उधार लेना पड़ता होगा। दवाइयां नहीं आती होंगी। त्योहार नहीं मनाए जाते होंगे। पता नहीं किन-किन जरूरतों को अगले दिन के लिए टाल दिया जाता होगा। जब काम मिलेगा तो उन जरूरतों को पूरा किया जाएगा।

प्रदूषण से निपटने के लिए एक झटके में लाखों लोगों के रोजगार के हक को छीन लिया गया। निर्माण कार्य पर पाबंदी यानी काम करने की उनकी संभावना पर पाबंदी।

पर क्या आपने कभी इस तरह का रोना-गाना देखा। किसी को इसका विरोध करते देखा। किसी को इस पाबंदी की खामियां दिखाते हुए देखा। किसी को यह कहते हुए देखा कि ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि, लाखों लोगों के रोजगार का क्या होगा। उनकी रोजी-रोटी का क्या होगा। किसी ने इस पाबंदी का विरोध किया होता।

लेकिन, इसके खिलाफ कोई नहीं आया। पिछले साल भी प्रदूषण से निपटने के लिए रोजगार पर लगाई गई इन पाबंदियों को मजदूरों ने बड़ी ही खामोशी से सहन किया था। इस बार भी सहन कर रहे हैं। अपने घरों में पता नहीं कौन-कौन सी मुश्किलें वे झेल रहे होंगे।


क्या प्रदूषण से निपटने के नाम पर सारा त्याग और बलिदान सिर्फ मजदूर और गरीब लोग करेंगे। बाकी लोग न तो पटाखे बजाने की अपनी हेकड़ी छोड़ना चाहते हैं और न ही अपनी शानदार गाड़ी का शौक।


पर्यावरण का नस्लभेद शायद यही है !!!




(फोटो दम घोंटने वाले स्मॉग की चादर में डूबी दिल्ली की है और इंटरनेट से ली गई)

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