पर्यावरण की परवाह किसे है?

उत्तराखंड के वन विभाग ने राजाजी नेशनल पार्क और नरेन्द्र नगर फारेस्ट डिवीजन की 778 हेक्टेयर जमीन को अस्थायी तौर पर कुंभ मेला के लिए देने का प्रस्ताव किया है. यह अस्थायी कितना है. नौ महीने का है. नौ महीनों के लिए यह जंगल कुंभ मेला के लिए देने का प्रस्ताव है. एक सितंबर 2020 से 31 मई 2021 तक के लिए इसे कुंभ मेला समिति को सौंपने का प्रस्ताव है. उत्तराखंड के जंगल विभाग के इस प्रस्ताव को केन्द्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय को अपनी सहमति देनी है.

- कबीर संजय


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लॉकडाउन के चलते भले ही लोग इस समय नीले आसमान को देख-देखकर मुग्ध हो रहे हों। घर और बालकनी में आए पक्षियों की आवाजें सुन-सुनकर खुश हो रहे हों। लेकिन, इसकी ज्यादा परवाह किसी को लगती नहीं है। कल ही लिखा था कि पर्यावरण संरक्षण मंत्रालय दरअसल पर्यावरण विनाश के लिए काम करता है।


अब उत्तराखंड के जंगल महकमे को देखिए। उत्तराखंड के वन विभाग ने राजाजी नेशनल पार्क और नरेन्द्र नगर फारेस्ट डिवीजन की 778 हेक्टेयर जमीन को अस्थायी तौर पर कुंभ मेला के लिए देने का प्रस्ताव किया है। यह अस्थायी कितना है। नौ महीने का है। नौ महीनों के लिए यह जंगल कुंभ मेला के लिए देने का प्रस्ताव है। एक सितंबर 2020 से 31 मई 2021 तक के लिए इसे कुंभ मेला समिति को सौंपने का प्रस्ताव है। उत्तराखंड के जंगल विभाग के इस प्रस्ताव को केन्द्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय को अपनी सहमति देनी है।


समझा जा सकता है कि इन नौ महीनों में यहां के जंगलों, पेड़ों, जंगली घासों, जंगली जीवों-प्राणियों का क्या होगा। वे नौ महीनों में दर-बदर हो जाएंगे। इन नौ महीनों में उनकी बरबादी की ऐसी कहानी लिखी जाएगी, जिसे फिर से बदलना मुश्किल साबित होगा। नौ महीनों में जब हाथी अपने जाने-पहचाने रास्तों से गुजरने की कोशिश करेंगे तो उन्हें कहा जाएगा कि हाथी पागल हो गए हैं। जब तेंदुआ किसी के घर में घुसेगा तो उस पर गोलियां दागी जाएगी। जब, बाघ आत्मरक्षा में भी किसी पर हमला कर देगा तो उसे नरभक्षी करार देकर शिकार पार्टियां आयोजित की जाएंगी।


आपको अगर याद हो तो लोगों को जीवन जीने का तरीका सिखाने वाले एक ढोंगी बाबा ने ऐसे ही यमुना के किनारे का ईकोसिस्टम अपने चंद दिनों के धार्मिक आयोजन के लिए बरबाद कर दिया था। उसकी भरपाई दोबारा नहीं हो पाई है।

इसीलिए कहता हूं कि नीला आसमान देखकर भले ही कितना ही खुश हो जाएं, लेकिन दरअसल यह सबकुछ मन बहलाव के तरीके हैं। पर्यावरण पर असली काम करने की इच्छा किसी में दिखती नहीं है।

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