अस्पृश्यता किसने ईजाद की?

यूं तो ब्राह्मण धर्म के किसी भी साहित्य से जाति एवं अस्पृश्यता के पक्ष में अनगिनत प्रमाण दिए जा सकते हैं लेकिन मैं जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता की पैदाइश को ब्राह्मण धर्म का अनिवार्य एवं मूल हिस्सा साबित करने के लिए केवल कुछ उदाहरण सामने रख रहा हूं-

- डॉ मोहन आर्या



जब से व्हाट्सप्प यूनिवर्सिटी का दौर शुरू हुआ है, कई दक्षिणपंथी मूर्ख या कहें धूर्त लोगों ने यह दुष्प्रचार जोर-शोर से शुरू कर दिया है कि अस्पृश्यता या जाति व्यवस्था प्राचीन भारत में कभी नहीं थी बल्कि यह तो मुगल शासकों और अंग्रेजों द्वारा षडयंत्र कर पैदा की गई है.


यह लोग दावा करते हैं कि हिंदू धर्म (हालांकि हिंदू एक अस्पष्ट टर्म है इसकी जगह पर ब्राह्मण धर्म इस्तेमाल होना चाहिए वैदिक साहित्य सहित किसी भी प्राचीन ब्राह्मण धर्म की किताब में हिंदू शब्द का उल्लेख ही नहीं है) में अस्पृश्यता मूल रूप से नहीं थी. अंग्रेजों के समय में अकाल पड़ने पर जब दलित लोगों ने मरे हुए पशुओं का मांस खाना शुरू किया तो अस्पृश्यता पैदा हुई.


इस तरह की बकवास हालांकि ध्यान देने लायक भी नहीं है लेकिन ब्राह्मण धर्म की एक सबसे बड़ी खासियत कहानियां और गप्पे ईजाद करना और इन गप्पों को लोक मान्यता का हिस्सा बना देना है. इसी एक खासियत के कारण ब्राह्मण धर्म ने हजारों सालों से अपना वर्चस्व कायम रखा है. इसलिए इन गप्पों पर भी गंभीरता से बात करनी जरूरी है.


दक्षिणपंथी तो अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं लेकिन साथ ही अपने आप को प्रोग्रेसिव और सेकुलर कहने वाले उच्च जाति के लोगों का रवैया भी बहुत ही निराशाजनक है. हाल ही में शशि थरूर ने कहा था, "अंग्रेजों से पहले भारत में जातियां तो जरूर थी लेकिन जाति व्यवस्था नहीं थी." अपनी सभ्यता को पश्चिम से महान बताने की कोशिश में कई लोगों ने साफ दिखाई देने वाले ऐतिहासिक साक्ष्यों की अनदेखी की है.


यूं तो ब्राह्मण धर्म के किसी भी साहित्य से जाति एवं अस्पृश्यता के पक्ष में अनगिनत प्रमाण दिए जा सकते हैं लेकिन मैं जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता की पैदाइश को ब्राह्मण धर्म का अनिवार्य एवं मूल हिस्सा साबित करने के लिए केवल कुछ उदाहरण सामने रख रहा हूं-


  1. ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में सबसे पहले 'वर्ण' का इस्तेमाल हुआ है. और उसके बाद ब्राह्मण धर्म की लगभग हर किताब में वर्ण का सामाजिक स्तरीकरण को इंगित करने के लिए इस्तेमाल हुआ है. गीता में वर्णों को दार्शनिक आधार पर स्थायित्व दे दिया गया है. 'जाति' का पहला इस्तेमाल यास्क के निरुक्त में हुआ है. जिसमें शूद्र जाति की एक महिला का जिक्र अपमानजनक रूप में किया गया है. यास्क के निरुक्त का समय ईसा से 400वर्ष पूर्व का माना गया है. इसका मतलब है कि जाति ईसा से 400 वर्ष पूर्व ईजाद हो चुकी थी. ( स्रोत: धर्मशास्त्र का इतिहास पांडुरंग काणे , वर्ण जाति व्यवस्था सुवीरा जायसवाल)

  2. ईसा से 300 वर्ष पूर्व पाणिनि ने एक सूत्र लिखा जिसकी टीका बाद में पतंजलि ने की. इस सूत्र के मुताबिक "गंदिकों, शकों और यवनों जैसे अनिर्वसित शूद्रों द्वारा इस्तेमाल किए गए बर्तनों को अग्नि इत्यादि द्वारा शुद्ध किया जा सकता है लेकिन मृतपों एवं चांडाल द्वारा इस्तेमाल किए गए बर्तनों को किसी भी तरह से शुद्ध नहीं किया जा सकता." ईसा से 300 वर्ष पूर्व लिखा गया यह सूत्र दिखाता है कि उस समय ही अस्पृश्यता का उदय हो चुका था. (स्रोत उपर्युक्त)

  3. किसी ब्राह्मण या द्विज द्वारा अस्पृश्यता के नियम का उल्लंघन हो जाने पर प्रायश्चित और व्रतों की सूची बनाई जाए तो कम से कम सप्ताह भर का समय तो लग ही जाएगा. मनुस्मृति नारद स्मृति पराशर स्मृति, विष्णु धर्मसूत्र, व्यास स्मृति आदि में इस तरह के व्रतों और प्रायश्चित विधियों का विस्तार से वर्णन किया गया है. चंद्रायण व्रत इनमें से एक व्रत है. ( स्रोत उपर्युक्त)

सारे ब्राह्मण धर्म शास्त्र वर्ण जाति, वर्णों के अलग-अलग कर्तव्य उन पर थोपी गई निर्योग्यता के तौर-तरीकों और नियमावलियों के पुलिंदे से अधिक और कुछ नहीं. आज भी दलितों को मंदिर जाने पर रोकने पीटने का काम ब्राह्मण धर्मी करते हैं. किसी मुस्लिम को दलितों के मंदिर जाने पर कोई एतराज नहीं. दलितों को घोड़ी चढ़ने से रोकने का काम भी ब्राह्मण धर्म के अनुयायी ही करते हैं और सबसे जरूरी बात जो ध्यान में रखने की है कि ऐसा करते हुए ब्राह्मणधर्मी केवल अपने धर्म का, उसके द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन कर रहे होते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं.

ब्राह्मण धर्म का मतलब ही है वर्ण धर्म, जाति धर्म इसके अलावा ब्राह्मण धर्म का कोई और मतलब ही नहीं है. बाबासाहेब ने कहा था,

" तो क्या हिंदू धर्म में ऐसा कोई सिद्धांत नहीं जिसके समक्ष आपस के तमाम भेदों के बावजूद नतमस्तक होना सभी हिंदू, अपना कर्तव्य मानते हो, मुझे लगता है ऐसा एक सिद्धांत है, और वह सिद्धांत है जाति का सिद्धांत."

( स्रोत: रिवॉल्यूशन एंड काउंटर रिवॉल्यूशन इन अन्सिएंट इंडिया, डॉक्टर भीमराव आंबेडकर )

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