कैसे रहेगी कमज़ोर मुट्ठी में तक़दीर?

पिछले तीस-चालीस सालों में जबसे समाज का कम्प्यूटरीकरण हुआ है, मुट्ठियों और मनुष्यों के साथ एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है. नयी पीढ़ियों की मुट्ठियों की ताक़त पहले से बहुत कमज़ोर पड़ी है. कारण कि ज़्यादातर काम ऑटोमेटेड होने से ग्रिप की ज़रूरत अत्यधिक घटती चली गयी है। माउस पर क्लिक करने वाले जब देर तक क़लम नहीं पकड़ पाते , तो उनसे बलपूर्वक मुट्ठी भींचने की कहाँ से उम्मीद की जाए!

- डॉ स्कन्द शुक्ला

पुरानी पीढ़ी नयी से पूछती है , "नन्हें-मुन्ने बच्चे , तेरी मुट्ठी में क्या है ?"


नयी का उत्तर है , "मुट्ठी में है तक़दीर हमारी , हमने क़िस्मत को बस में किया है !"


पुरानी नयी की ओर इशारा करती है : सामने बार पर एक पुलअप लगाकर तो दिखाओ। अभिधा में मुट्ठी कितनी मज़बूत है, पहले देख लें। फिर लक्षणा की बात होती रहेगी। नयी पीढ़ी आगे बढ़ती है , दोनों हाथों से बार को जकड़ती है और शरीर को ऊपर ले जाने का प्रयास करती है। लेकिन यह क्या ! उससे एक पुलअप भी नहीं होता !


संसार-भर के मनुष्यों की मुट्ठी की जकड़ यानी ग्रिप-स्ट्रेंथ घटती जा रही है, यह बात तो विज्ञान जानता रहा है। हमारे पूर्वज कभी पेड़ों पर सुरक्षा पाते होंगे, तब हमें मुट्ठियों का मूल्य पता रहता होगा। बार-बार पेड़ों पर लटकने से होता जाता अभ्यास मुट्ठियों की भिंचन को और-और मज़बूत बनाता होगा। फिर उन्होंने पेड़ छोड़े और भूमि पर रहना शुरू कर दिया। लेकिन अब भी औज़ारों की ज़रूरत कामकाज में थी ही। उनके सहारे शिकार जो होता था और दैनिक काम भी। इसलिए मुट्ठी कुछ कमज़ोर तो पड़ी , किन्तु उसमें पर्याप्त शक्तिमत्ता बनी रही।


लेकिन पिछले तीस-चालीस सालों में जबसे समाज का कम्प्यूटरीकरण हुआ है, मुट्ठियों और मनुष्यों के साथ एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। नयी पीढ़ियों की मुट्ठियों की ताक़त पहले से बहुत कमज़ोर पड़ी है। कारण कि ज़्यादातर काम ऑटोमेटेड होने से ग्रिप की ज़रूरत अत्यधिक घटती चली गयी है। माउस पर क्लिक करने वाले जब देर तक क़लम नहीं पकड़ पाते , तो उनसे बलपूर्वक मुट्ठी भींचने की कहाँ से उम्मीद की जाए !


लेकिन प्रश्न यह उठता है कि मुट्ठियों से इतना मोह क्यों ? पकड़ने और प्रहार करने में मुट्ठियों की अब भला क्या ज़रूरत , जो इनका इतना अभ्यास किया जाए ! ऐसे में विज्ञान के वे शोध सामने रखने चाहिए , जो मुट्ठियों की शक्ति को मात्र मुट्ठियों तक सीमित रखकर नहीं सोचते , बल्कि इनसे शरीर के सम्पूर्ण स्वास्थ्य का एक अंदाज़ा पा लेते हैं। मुट्ठियाँ कमज़ोर होने का सम्बन्ध लैंसेट जैसी मेडिकल-शोध-पत्रिका जब मृत्युदर और हृदय-सम्बन्धी मृत्यु-दर से जोड़कर देखती है , तो 2015 में आया यह शोध संसार-भर में खलबली बचा देता है।


मुट्ठी कमज़ोर यानी मांसपेशीय क्षीणता। मांसपेशीय क्षीणता अर्थात् शरीर का स्वास्थ्य वैसा नहीं , जैसा होना चाहिए। यद्यपि इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि लोग मुट्ठियाँ मज़बूत करें और अन्य अंगों को नज़रअंदाज़ कर दें। बल्कि उन्हें मुट्ठियों की ताक़त को सम्पूर्ण शरीर की प्रतिनिधि शक्ति और स्वास्थ्य के रूप में देखना और समझना चाहिए। ग़ौर करने वाली बात यह है कि जो व्यायाम करेंगे , वही मुट्ठियों के भी व्यायाम करेंगे। और जिनके पास ओवर-ऑल बढ़िया शक्तिमत्ता और स्वास्थ्य होंगे , उनकी मुट्ठियाँ भी बेहद मज़बूत होंगी। ऐसे में किसी एक पीढ़ी में ग्रिप-स्ट्रेंथ सीधे 20 प्रतिशत गिर जाए , तो समझिए कि कितनी तेज़ी से हम शारीरिक शक्ति और स्वास्थ्य खो रहे हैं।


दलीलें विरोध में भी हैं। उठ रही हैं। केवल मुट्ठी से सम्पूर्ण स्वास्थ्य का प्रतिनिधित्व पा लेना क्या सही है ? महिला-समुदाय की मुट्ठियों की शक्ति एक लिंग-समूह के रूप में पुरुष-समूह से कम रहती है, लेकिन दीर्घजीविता के मामले में वे पुरुषों से आगे हैं। पिछली पीढ़ियों की तुलना में हमारी मुट्ठियाँ भले कमज़ोर पड़ी हों, किन्तु लाइफ़-स्पैन क्या बढ़ा नहीं है !


उत्तर है कि जीवन-काल का बढ़ना और स्वस्थ रहना एकदम एक ही बात नहीं हैं। लम्बा जीवन दवाओं के सहारे जिया जा सकता है, लेकिन उसे स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर स्वस्थ व्यक्ति किसी दुर्घटना में जल्दी दम तोड़ सकता है। पुराने लोगों के पास मज़बूत शरीर होते थे , दीर्घजीविता चाहे हम-सी न होती हो। हम दीर्घजीवी हुए हैं , लेकिन हमने पुष्ट-शक्त शरीर खोये हैं।


मुट्ठियों की शक्ति डायनैमोमीटर नामक यन्त्र से नापी जाती है। हर उम्र में अलग-अलग होती है। स्त्रियों-पुरुषों में अलग-अलग। मेकैनिक की अधिक आती है , सेल्समैन की कम। लेकिन बदलाव यह हुआ है कि आधुनिक मेकैनिक की पुराने मेकैनिक की तुलना में भी घट गयी है। कारण है अधिकाधिक काम का ऑटोमेशन और आसानीकरण।


बच्चों को बार से लटका कर वैज्ञानिकों ने कई प्रयोग किये हैं। दस सेकेण्ड तक वे अपनी ग्रिप के सहारे लटके रह सकते हैं। यह वह विकासवाद का सम्बन्ध है , जो हमें याद दिला रहा है कि हमारे पुरखे पहले कहाँ रहते थे और किस तरह काम करते थे। मुट्ठियाँ पुरानी पीढ़ियों से नयी को जोड़ती रही हैं। लेकिन अब यह जुड़ाव छूट रहा है , टूट रहा है।


हमारी अग्रभुजाओं (फोरआर्म) में एक मांसपेशी हुआ करती है : पामैरिस लॉन्गस। मेडिकल छात्र इससे भलीभाँति परिचित हैं। जब हमारे पुरखे वृक्षवास करते थे , तो यह विकसित हुआ करती थी। अब यह क्षीणतर होती जा रही है और एकदिन सम्भव है कि अपेंडिक्स की ही तरह हम इसे भी कामकाज के दृष्टिकोण से खो देंगे। आधुनिक समाज में अधिकांश लोग पामैरिस लॉन्गस का इस्तेमाल करके कोई काम नहीं करते।


आप का दैनन्दिन कार्य कितना मुष्टिका-प्रधान है ? अगर काम में मुट्ठी का इस्तेमाल नहीं करते , तो क्या आप मुट्ठी को मज़बूत करने के लिए कोई व्यायाम करते हैं ? याद रखिए : कमज़ोर मुट्ठी का सम्बन्ध बुढ़ापे और बुरी सेहत दोनों से है और लम्बा जीवन बूढ़ा और बीमार होकर भी जिया जा सकता है , लेकिन उसका सुख नहीं लिया जा सकता।


मुट्ठी क्या है ? शरीर की ताक़त और सेहत का सटीक सैम्पल !


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