क्यों ग़ायब हुए गिद्ध?

भारत में मोटा-मोटी गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती थीं। इनमें से कुछ प्रजातियों की संख्या तो करोड़ों में थी। देश के लगभग सभी हिस्सों में इनकी मौजूदगी थी। लेकिन इंसान की एक छोटी सी चूक ने गिद्धों की आबादी को लगभग साफ कर दिया।

- कबीर संजय

हमारी भाषा और समाज पता नहीं क्यों गिद्धों के प्रति नकारात्मक भाव रखता है। जबकि प्रकृति और पर्यावरण को समझने और उससे लगाव रखने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है कि हमारी दुनिया के लिए गिद्ध कितने ज्यादा जरूरी है। वो कुछ ऐसा काम करते हैं जो उनके बिना होना संभव नहीं है। अगर होगा भी तो उसकी इतनी विकृतियां सामने आएंगी कि उसे भुगतना आसान नहीं होगा। कुछ ऐसी परिस्थितियों का सामना आजकल हम कर रहे हैं।

मैं अपने बचपन के दिनों को याद करता हूं तो उसमें झुंड के झुंड गिद्धों के चित्र भी याद आते हैं। मेरे घर के बगल में पीपल के बड़े पेड़ पर गिद्ध बैठा करते थे। जब वे उड़ते तो हमारी पतंग की डोर कई बार उनके बड़े-बड़ै डैने में उलझ जाती और वे हमारी पतंग उड़ाकर ले जाते। नीले आसमान में बहुत ऊपर उड़ते हुए उनके काले-काले धब्बे दिखाई पड़ते थे। वे उड़ते नहीं थे, बस हवाओं में मौजूद अलग-अलग धाराओं में अपना पंख खोले तैरते रहते थे। लेकिन निगाहें उनकी जमी पर ही मौजूद होती। जहां कहीं कोई मरा हुआ पशु उन्हें दिखा नहीं, वे नीचे उतर आते थे। तुरंत ही उसकी साफ-सफाई में जुट जाते। प्रकृति ने उन्हें यही काम सौंपा था। हाजमा उनका मजबूत था। सड़े हुए पशुओं के मांस को भी वे पचा जाते।

भारत में मोटा-मोटी गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती थीं। इनमें से कुछ प्रजातियों की संख्या तो करोड़ों में थी। देश के लगभग सभी हिस्सों में इनकी मौजूदगी थी। लेकिन इंसान की एक छोटी सी चूक ने गिद्धों की आबादी को लगभग साफ कर दिया। 1990 के आसपास पशुओं की चिकित्सा में डायक्लोफेनॉक नामक दवा का इस्तेमाल शुरू किया गया। इसी के बाद गिद्धों की आबादी अचानक ही खतरनाक तरीके से कम होने लगी। झुंड के झुंड गिद्ध मरने लगे।

यहां तक कि पक्षी विशेषज्ञों को भी कुछ समझ नहीं आया। तमाम शोध के बाद पता चला कि डायक्लोफेनॉक दवा के इस्तेमाल के बाद भी कई सारे पशु मर जाते थे। चमड़ा उतारकर उन्हें श्मशान में जंगल के किनारे फेंक देते थे। लेकिन, इस मांस को खाने से गिद्ध की किडनी फेल हो जाती थी। डायक्लोफेनॉक जैसी एक दवा ने 15-20 सालों में गिद्दों की 95 फीसदी आबादी समाप्त कर दी। इसका पता चलते ही डायक्लोफेनॉक का इस्तेमाल पशुओं की चिकित्सा में करने पर रोक लगा दी गई। भारत के बाद नेपाल और पाकिस्तान ने भी यही कदम उठाए। लेकिन, तब तक काफी देर हो चुकी थी। अब गिद्धों के संरक्षण के तमाम प्रयास चल रहे हैं। पर गिद्धों की आबादी फिर से तीस साल पहले के स्तर पर पहंच पाएगी ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

और इसका दुष्प्रभाव क्या हुआ। गिद्ध जो काम करते थे, वो काम कौन करता। कई गांवों में सियारों और आवारा कुत्तों ने यह काम करना शुरू कर दिया। लेकिन उनके हाजमे इतने मजबूत नहीं थे। मांस की ज्यादा तादाद और मांस के सड़ने के दौरान उसमें पनपने वाले हानिकारक कणों को वे पचा नहीं पाते। इससे उनकी आक्रामकता में वृद्धि हुई और वे रेबीज जैसी बीमारियों के भी शिकार होने लगे। गांवों में सियार और कुत्ते जैसे जानवरों के काटने का शिकार होने वालों की तादाद पहले की तुलना में बढ़ गई है। इनमें से कई लोग इलाज नहीं मिलने के चलते मर भी जाते हैं। इस पर करोड़ों का बजट भी खर्च होता है। जो काम गिद्ध मुफ्त में करते थे, उसके लिए अब करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।

इसलिए गिद्ध के प्रति नकारात्मक भाव रखना भी एक प्रकार की नकारात्मकता है। अगर कोई है जो पृथ्वी को नोंच-नोंचकर खा रहा है तो वो सिर्फ इंसान है। वही इस प्रकृति और पर्यावरण को तबाह करने पर तुला हुआ है। कोई पक्षी और जानवर तो ऐसा कतई नहीं करता।


#jungalkatha #जंगलकथा #जंगलमन