क्यों करते हैं इंसान धरती पर राज?

प्रो. युवाल नोह हरारी यरुसलम विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाते हैं. उनके लिए इतिहास संस्कृति के जन्म के साथ शुरू नहीं होता बल्कि वह उसे बहुत-बहुत पीछे ब्रह्मांड के उद्भव तक ले जाते हैं. इतिहास को जैविक उद्विकास के नज़रिए (ईवोल्युशनरी पर्सपेक्टिव) से देखने का उनका तरीका उन्हें ख़ास बनाता है. उनका एक लेख (क्या 21वीं सदी में किसी काम का रह जाएगा इंसान) मैं पहले भी आप सब के साथ साझा कर चुका हूँ. इस बार पढ़िए TED TALKS में दिया उनका भाषण.

अनुवाद और प्रस्तुति: आशुतोष उपाध्याय


पचहत्तर हज़ार साल पहले हमारे पुरखे मामूली जानवर थे. प्रागैतिहासिक इंसानों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात हम यही जानते हैं कि वे ज़रा भी महत्वपूर्ण नहीं थे. धरती में उनकी हैसियत एक जैली फिश या जुगनू या कठफोड़वे से ज्यादा नहीं थी.  इसके विपरीत, आज हम इस ग्रह पर राज करते हैं. और सवाल उठता है: वहां से यहां तक हम कैसे पहुंच गए? हमने खुद को अफ्रीका के एक कोने में अपनी ही दुनिया में खोए रहने वाले मामूली वानर से पृथ्वी के शासक में कैसे बदल डाला?


अमूमन हम अपने और अन्य सभी जानवरों के बीच व्यक्तिगत स्तर पर अंतर खोजते रहते हैं. हम यह विश्वास करना चाहते हैं- मैं यह विश्वास करना चाहता हूं- कि मुझ में कुछ तो ख़ास है, मेरे शरीर में, मेरे दिमाग़ में, जो मुझे एक कुत्ते या एक सूअर या एक चिम्पैंजी से श्रेष्ठ बनाता है.


लेकिन सच यही है कि मैं शर्मिंदगी की हद तक एक चिम्पैंजी जैसा ही हूँ. अगर आप मुझे और एक चिम्पैंजी को साथ-साथ किसी निर्जन द्वीप पर छोड़ दें, और पूछें कि खुद को जिन्दा रखने के संघर्ष में कौन बेहतर साबित होगा. तो इस सवाल पर मैं खुद अपने बजाय चिम्पैंजी पर दांव लगाना चाहूंगा. ऐसा कतई नहीं कि व्यक्तिगत रूप से मुझमें कोई गड़बड़ी है. मेरा अंदाज़ा है कि आप में से किसी को भी अगर चिम्पैंजी के साथ उस द्वीप में छोड़ दिया जाय, चिम्पैंजी हर हाल में आप पर भारी पड़ेगा.


मनुष्य और अन्य सभी जानवरों के बीच वास्तविक अंतर व्यक्तिगत स्तर पर नहीं होता; दरअसल यह अंतर सामूहिक स्तर पर होता है. इंसान पृथ्वी पर इसलिए राज कर पाते हैं, क्योंकि वे अकेले ऐसे जानवर हैं जो बड़े लचीलेपन से और बहुत बड़ी संख्या में सहयोगपूर्ण व्यवहार कर पाने में सक्षम हैं.


हां, कुछ और जीव भी हैं- जैसे सामाजिक कीट, मधुमक्खियां, चींटियां- ये भी बहुत बड़ी संख्या में सहयोगपूर्ण व्यवहार करते  हैं, लेकिन उनके सहयोग में लचीलापन नहीं होता. वे अत्यंत अनम्य तरीके से सहयोग करते  हैं. मधुमक्खियों के छत्तों का कामकाम सिर्फ एक ही तरीके से चलता है.


और अगर कहीं कोई नई संभावना या कोई नया खतरा पैदा हो जाय तो मधुमक्खियां अपनी सामाजिक व्यवस्था को रातों-रात नहीं बदल सकतीं. उदाहरण के लिए, वे अपनी रानी को फांसी के तख्ते पर टांगकर मधुमक्खियों का गणतंत्र या फिर कामगार मधुमक्खियों का साम्यवादी अधिनायकत्व स्थापित नहीं कर सकतीं.


अन्य जानवर, जैसे सामाजिक स्तनधारी- भेड़िए, हाथी, डोल्फिन और चिम्पैंजी- कहीं ज्यादा लचीलेपन के साथ सहयोगपूर्ण व्यवहार करते हैं. लेकिन वे ऐसा बहुत छोटी संख्या में कर पाते हैं. क्योंकि चिम्पैंजियों के बीच यह सहयोग एक दूसरे के बारे में बेहद करीबी जानकारी के आधार पर होता है.


मैं एक चिम्पैंजी हूं और आप एक चिम्पैंजी हैं और मैं आपके साथ सहयोग करना चाहता हूं. इसके लिए मुझे आपको व्यक्तिगत तौर पर जानना होगा. आप किस किस्म के चिम्पैंजी हैं? क्या आप एक नेक चिम्पैंजी हैं? क्या आप एक दुष्ट चिम्पैंजी हैं. क्या आप पर भरोसा किया जा सकता है? अगर मैं आपको नहीं पहचानता तो मैं कैसे आपके साथ सहयोग कर सकता हूं?


अकेला जीव, जिसे इन दोनों खूबियों- बहुत बड़ी संख्या में और भरपूर लचीलेपन के साथ सहयोगपूर्ण व्यवहार करने में महारत हासिल है, वह हम मनुष्य ही हैं- होमो सेपियंस.


एक बनाम एक या यहां तक कि 10 बनाम 10 के लिहाज से, चिम्पैंजी हम पर भारी पड़ेंगे. लेकिन अगर आप 1000 इंसानों को 1000 चिम्पैंजियों के सामने खड़ा कर देंगे, तो इंसान आसानी से बाज़ी मार ले जाएंगे. वजह बेहद मामूली कि हजार चिम्पैंजी सहयोगपूर्ण ढंग से कतई नहीं रह सकते. और अगर आप एक लाख चिम्पैंजियों को ऑक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट या वेम्बली स्टेडियम या तिएनमान चौक या वेटिकन में धकेल देंगे तो वहां पूरी तरह अफरा-तफरी मच जाएगी. जरा कल्पना कीजिए- एक लाख चिम्पैंजियों से भरे वेम्बली स्टेडियम की! पागलपन की हद.


इसके विपरीत, इंसान सामान्यतया हजारों-लाखों की तादाद में इकठ्ठा होते हैं और आम तौर पर जरा भी अफरा-तफरी नहीं होती. बल्कि दिखाई देता है सहयोग का अत्यंत परिष्कृत और प्रभावशाली नेटवर्क. समूचे इतिहास में दर्ज़ महान इंसानी उपलब्धियां- चाहे वह पिरामिडों का निर्माण हो या फिर चांद का सफ़र- किसी की व्यक्तिगत क्षमताओं का नतीजा नहीं बल्कि बड़ी संख्या में भरपूर लचीलेपन के साथ मिलजुलकर काम करने की हमारी क्षमता का परिणाम है.

अब इस भाषण को ही लीजिए, जो इस वक्त मैं आपके- लगभग 300 या 400 श्रोताओं- के सामने दे रहा हूं. आपमें से अधिकतर को मैं बिलकुल नहीं जानता. इसी प्रकार, मैं आज के इस आयोजन की योजना बनाने वाले और उसे अंजाम देने वाले सभी लोगों को नहीं जानता. मैं उस विमान के पायलट और उसके क्रू मेम्बर्स को नहीं जानता जो कल मुझे यहां लन्दन लेकर आया. मैं उन लोगों को नहीं जानता जिन्होंने मेरी बातों को रिकॉर्ड करने वाले इस माइक्रोफोन और इन कैमरों को खोजा और बनाया. मैं उन लोगों को नहीं जानता, जिनकी किताबों और लेखों को मैंने इस भाषण की तैयारी के लिए पढ़ा. और निश्चय ही मैं उन तमाम लोगों को भी नहीं जानता जो ब्यूनस आयर्स या नई दिल्ली में कहीं बैठे इंटरनेट पर मेरे इस भाषण को देख रहे हैं. बावजूद इसके कि हम एक-दूसरे को नहीं जानते, हम विचारों के वैश्विक आदान-प्रदान के लिए एक साथ काम कर सकते हैं .


यह एक ऐसी चीज़ है जो चिम्पैंजी नहीं कर सकते. बेशक वे आपस में संवाद कर सकते हैं, लेकिन आप ऐसे चिम्पैंजी को नहीं ढूंढ सकते जो कहीं दूर किसी और चिम्पैंजी झुण्ड को, केलों या हाथियों या उनकी दिलचस्पी के किसी अन्य विषय पर भाषण देने के लिए यात्रा कर रहा हो.


हां, सहयोग बेशक हमेशा किसी अच्छी बात के लिए ही होता हो, ऐसा नहीं है. समूचे इतिहास में इंसानों ने जितने भी वीभत्स कृत्य किए हैं- और आज भी हम कई अत्यंत वीभत्स कृत्य कर रहे हैं- ये सभी काम बड़ी संख्या में किए जाने वाले सहयोगपूर्ण व्यवहार का परिणाम हैं. जेल सहयोग से पैदा होने वाली व्यवस्था है; जनसंहार केंद्र सहयोग आधारित व्यवस्था है; यातना शिविर सहयोग आधारित व्यवस्था है. चिम्पैंजियों के पास जनसंहार केंद्र और जेल और यातनाशिविर नहीं होते.


अब मान लीजिए मैं आपको यह समझाने में सफल हो जाता हूं कि हम धरती पर इसलिए शासन कर पाते हैं क्योंकि हममें लचीलेपन सहित बड़ी संख्या में सहयोग करने की क्षमता है. एक जिज्ञासु श्रोता के मन में इस दावे से तुरंत यह सवाल पैदा हो सकता है: ऐसा हम ठीक-ठीक कैसे कर पाते हैं? तमाम जानवरों से अलग वह कौन सी बात है जो एकमात्र हमें इस तरह सहयोग कर पाने लायक बनाती है?


इसका जवाब है हमारी कल्पनाशक्ति. हम असंख्य अजनबियों के साथ लचीलेपन सहित इसलिए सहयोग कर पाते हैं, क्योंकि इस ग्रह के सभी जीवों में अकेले हम कपोल कल्पनाएं करने व कहानियां गढ़ने और उन पर विश्वास करने में सक्षम हैं. जब तक लोग इन कहानियों में विश्वास करते रहेंगे, वे इसके नियमों, उसूलों और मूल्यों का पालन करेंगे.

बाकी सभी जीव अपने संवाद तंत्र का इस्तेमाल यथार्थ को प्रकट करने भर के लिए करते हैं. एक चिम्पैंजी कह सकता है, “देखो! वहां शेर बैठा है, चलो भाग चलें!” या, “देखो! वो वहां केले का पेड़ है! चलो चलकर केले खाएं!” इसके विपरीत, मनुष्य अपनी भाषा का इस्तेमाल यथार्थ का वर्णन करने मात्र के लिए नहीं करता, बल्कि नए यथार्थ, काल्पनिक यथार्थ गढ़ने के लिए भी करता है. एक मनुष्य कह सकता है, “देखो, वहां ऊपर आसमान में भगवान बैठे हैं! और अगर तुम मेरे कहे अनुसार आचरण नहीं करोगे तो तुम्हारी मृत्यु के बाद वह तुम्हें दंड देंगे. तुम्हें नर्क में भेज देंगे.” अगर आप सब मेरी गढ़ी हुई इस कहानी पर विश्वास करेंगे तो आप उसमें सुझाए गए तौर-तरीकों, नियमों व मूल्यों का अनुसरण करने लगेंगे और उसकी मान्यताओं के आधार पर सहयोग करने लगेंगे. यह एक ऐसी चीज़ है जो सिर्फ इंसान ही कर सकते हैं.

आप किसी चिम्पैंजी को यह कहकर नहीं पटा सकते कि “अगर तुम यह केला मुझे दे दोगे तो मरने के बाद तुम्हें चिम्पैंजियों का स्वर्ग नसीब होगा…” “… और अपने अच्छे कर्मों के लिए तुम्हें वहां केले के ढेर के ढेर मिलेंगे.”  कोई चिम्पैंजी इस तरह की कहानी में कभी भी विश्वास नहीं करेगा. सिर्फ इंसान ऐसी कहानियों में विश्वास करते हैं. और इसी वजह से हम इस दुनिया में राज कर पाते हैं, जबकि चिम्पैंजी चिड़ियाघरों और प्रयोगशालाओं मे