संयुक्त राष्ट्र से कश्मीर का 'सच' क्यों छुपाना चा​हती है मोदी सरकार?

भाजपा का सारा प्रचार तंत्र लोगों को यही विश्वास दिलाना चाहता है कि कश्मीर में जो पिछले 25 दिनों से सरकार ने तालाबंदी की हुई है, उसे तो दुनिया देख ही नहीं रही है. दुनिया को तो बस तभी पता चल रहा है जब उच्चतम न्यायालय इस मामले को संविधान पीठ को भेजेगा या फिर जब विपक्षी नेता कश्मीर में सरकारी कार्यवाही के खिलाफ बयान देंगे.

- इन्द्रेश मैखुरी




जम्मू कश्मीर में धारा 370 को खत्म किए जाने और इससे जुड़े अन्य मामलों पर उच्चतम न्यायालय में बुधवार को सुनवाई हुई. इस सुनवाई में उच्चतम न्यायालय ने माकपा के महासचिव कामरेड सीताराम येचुरी को जम्मू कश्मीर के पार्टी नेता और पूर्व विधायक मोहम्म्द युसुफ तारीगामी से मिलने की अनुमति दी. कानून के स्नातक मोहम्म्द अलीम सईद को भी कश्मीर में अपने परिवार से मिलने की अनुमति कोर्ट ने दी.


इसके अतिरिक्त जम्मू कश्मीर से धारा 370 को खत्म करने और जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुनवाई के लिए संविधान पीठ को सौंप दिया गया. उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले तीन न्यायाधीशों की पीठ ने जब उक्त मामले को संविधान पीठ को सौंपने का निर्णय सुनाया तो एटॉर्नी जनरल के.के.वेणुगोपाल और सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने इस फैसले का विरोध किया. केंद्र सरकार के इन दोनों वकीलों का तर्क था कि 370 मसले के अंतर्राष्ट्रीय और सीमा पार प्रभाव हैं. यहाँ(न्यायालय में) जो भी बयान दिया जाएगा,वह संयुक्त राष्ट्र को भेज दिया जाएगा.


एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल और सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता द्वारा उच्चतम न्यायालय में दिया गया यह तर्क ही केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर में की गयी कार्यवाही पर प्रश्न उठाने वाले हर व्यक्ति के खिलाफ केंद्र सरकार और भाजपा का मुख्य तर्क है.


भाजपा का सारा प्रचार तंत्र लोगों को यही विश्वास दिलाना चाहता है कि कश्मीर में जो पिछले 25 दिनों से सरकार ने तालाबंदी की हुई है, उसे तो दुनिया देख ही नहीं रही है. दुनिया को तो बस तभी पता चल रहा है जब उच्चतम न्यायालय इस मामले को संविधान पीठ को भेजेगा या फिर जब विपक्षी नेता कश्मीर में सरकारी कार्यवाही के खिलाफ बयान देंगे. पाकिस्तान की मानवाधिकार मंत्री डा. शिरीन मजारी द्वारा संयुक्त राष्ट्र को पत्र भेजने के बाद यह तर्क फिर ज़ोरशोर से उछाला जा रहा है कि विपक्षी नेताओं की कश्मीर में सरकारी कार्यवाही पर सवाल उठाने वाले बयान, पाकिस्तानी मंत्री को भारत के खिलाफ अभियान चलाने में सहायक सिद्ध हुए.

पाकिस्तान की मानवाधिकार मंत्री डा. शिरीन मजारी का पत्र

पर क्या यह हकीकत है? जी नहीं. पाकिस्तानी मंत्री का संयुक्त राष्ट्र को लिखा सात पेज लंबा पत्र सिर्फ विपक्षी नेताओं के बयानों पर आधारित नहीं है. बल्कि भाजपा के विधायकों और मुख्यमंत्रियों के बयानों ने भी उसमें पर्याप्त जगह पायी है. उन बयानों का इस्तेमाल पाकिस्तानी मंत्री ने भारतीयों के कश्मीरियों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण की पुष्टि के लिए किया है.


पाकिस्तानी मंत्री ने अपने पत्र में पहला बिन्दु लिखा है: लिंग आधारित हिंसा,युद्ध का औज़ार. इस बिन्दु में वे दिनांक सहित कश्मीरी महिलाओं के बारे में भाजपा नेताओं के बयानों का उल्लेख करती हैं. अपने पत्र में पाकिस्तानी मंत्री ने लिखा कि 6 अगस्त 2019 के आसपास एक भाजपा विधायक विक्रम सैनी का विडियो वाइरल हुआ,जिसमें वे कि “मुस्लिम पार्टी कार्यकर्ताओं को नयी स्थितियों का आनंद लेना चाहिए. वे अब गोरी चमड़ी वाली कश्मीरी महिलाओं से शादी कर सकते हैं.”


हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने 10 अगस्त 2019 को एक बयान दिया,जिसमें उन्होंने कहा कि “कुछ लोग कह रहे हैं कि अब कश्मीर खुल गया है तो वहाँ से दुल्हन लाएँगे..” मनोहर लाल खट्टर के इस बयान को भी पाकिस्तानी मंत्री ने भारत में कश्मीर के प्रति लैंगिक पूर्वाग्रह के उदाहरण के तौर पर अपने पत्र में उद्धृत किया.


पाकिस्तानी मंत्री तो अपने पत्र में लिखती हैं कि 5 अगस्त 2019 से गूगल पर “कश्मीरी महिलाओं से विवाह कैसे करें” खोजने वालों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो गयी. यह तथ्य भारत के किसी समाचार माध्यम में आया हो न आया हो पर पाकिस्तानी मंत्री ने इसे भारत का कश्मीरी महिलाओं के प्रति लैंगिक द्वेष के उदाहरण के तौर पर पेश किया है. विपक्षी नेताओं के बयानों से तो जो भी हुआ हो पर इस तरह के बयान और कृत्य निश्चित ही देश के लिए शर्मिंदगी के सबब हैं.


जितना तफसील से भाजपा के उक्त नेताओं के बयानों का उल्लेख पाकिस्तानी मंत्री ने अपने पत्र में किया है, उतना किसी विपक्षी नेता के बयान को नहीं किया है. परंतु भाजपा और उसका पूरा प्रचार तंत्र अपने नेताओं, विधायकों और मुख्यमंत्रियों के छिछोरे, वाहियात बयानों और हरकतों से शर्मिंदा नहीं है. वह इसे देश के लिए शर्मिंदगी की बात भी नहीं समझते हैं. लेकिन कश्मीरी अवाम के लोकतान्त्रिक अधिकारों के पक्ष में खड़ी आवाजों को खामोश करने के लिए जरूर वे दूसरे देशों द्वारा उनकी बातों को इस्तेमाल किए जाने को हव्वे की तरह प्रयोग कर रहे हैं.


पाकिस्तान क्या कहेगा,संयुक्त राष्ट्र में क्या होगा से ज्यादा महत्वपूर्ण तो कश्मीर और वहाँ के लोगों के हालात हैं. वहाँ के लोगों के अधिकार पर ताला लगा रहे, विपक्षी से लेकर अदालत तक भी सब मुंह सी लें तो क्या दुनिया को वहाँ के हालात का पता नहीं चलेगा? आधुनिक संचार माध्यमों के इस दौर में यह खामखयाली है, शतुरमुर्ग जैसी सोच है. याद करिए कश्मीर में सरकार विरोधी प्रदर्शनों की शुरुआती खबरें बीबीसी, एएफपी और अल जज़ीरा ने दी. पहले-पहल केंद्र सरकार ने उनका खंडन किया पर बाद में उसे, इन विरोध प्रदर्शनों की सत्यता को स्वीकार करना पड़ा. न्यू यॉर्क टाइम्स, टाइम, वाल स्ट्रीट जर्नल, राइटर्स जैसे दुनिया के तमाम प्रकाशनों और समाचार एजेंसियों ने कश्मीर के हालात पर समाचार प्रकाशित किए.


एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल और सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता के संयुक्त राष्ट्र तक बात पहुंचेगी वाले तर्क के जवाब में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा- “क्या इसका मतलब यह है कि उच्चतम न्यायालय अपना काम न करे? हम अपने कर्तव्य का पता है.” भाजपा के कुत्सा प्रचार का यही सही जवाब है. पाकिस्तानी सरकार, जिसका मानवाधिकारों के मामले में अपना रिकॉर्ड खराब है, कट्टरपंथ और आतंक के पोषक वे बने हुए हैं, वे क्या कहेंगे, इसकी बहुत परवाह करने की जरूरत नहीं है. लेकिन कश्मीर हमारा है और कश्मीरी हमारे अपने लोग. इसलिए कश्मीरियों के पक्ष में खड़ा होना हमारा कर्तव्य है.

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