हम ओलंपिक्स क्यों नहीं जीत पाते?

इन खिलाड़ियों की उम्र पर ध्यान दीजिए. और सोचिए हमारे आस-पास के इस उम्र के बच्चे क्या खेल रहे है? कहाँ खेल रहे है?

- Shiwani Pandey


जापान की 13 साल की निशिया मोमोजी ने टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीत लिया. उन्होंने महिलाओं की स्ट्रीट स्केटबोर्डिंग में गोल्ड मेडल जीतकर सनसनी मचा दी.


इस प्रतियोगिता में रोचक बात ये रही कि रजत पदक जीतने वाली ब्राज़ील की रेयसा लीएल भी 13 साल की हैं, और कांस्य पदक पर क़ब्ज़ा जमाने वाली जापान की फुना नाकायामा 16 साल की हैं.


हालॉंकि निशिया मोमोजी को सबसे कम उम्र में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने की शोहरत नहीं मिल सकी है, क्योंकि यह ख़िताब अब भी 13 साल की ही अमेरिकन एथ​लीट मारजोरी गेस्ट्रिंग के नाम है जिन्होंने 1936 के बर्लिन ओलंपिक्स में स्प्रिंगबोर्ड ड्राइविंग में यह कारनामा कर दिखाया था. वही बर्लिन ओलंपिक्स जिसका इस्तेमाल हिटलर ने नाज़ी प्रोपेगेंडा के लिए किया था.


मारजोरी गेस्ट्रिंग उस वक़्त निशिया मोमोजी से भी 63 दिन छोटी थीं.


इन खिलाड़ियों की उम्र पर ध्यान दीजिए. और सोचिए हमारे आस-पास के इस उम्र के बच्चे क्या खेल रहे है? कहाँ खेल रहे है? क्या उनके स्कूलों में खेल का मैदान है? क्या आपके गाँव, मौहल्ले, कस्बे, शहर में खेल का मैदान अब भी है? या वो किसी और काम पर लगाया जा चुका है?


जब किसी खिलाड़ी की उपलब्धि की कोई ख़बर आती है तो उसके अपने संघर्ष की कहानी आती है. कैसे उसने ट्रेनिंग के लिए 15-20-30-50-80 किलोमीटर का सफर हर रोज तय किया. अपने खुद के पैसे लगा कर घर वालों ने कोच रखे. कपड़े नहीं थे, दौड़ने के लिए जूते नहीं थे, खाने के लिए पैसे नहीं थे.. और भी बहुत से संघर्षों की कहानियाँ. असल में इन संघर्षों की कहानियों की इबारतें ऐसी नहीं होती अगर सरकार की प्राथमिकता में कभी 'खेल' या 'खिलाड़ी' होते.


यह तथ्य है कि खेल प्रतिस्पर्धाओं में किसी भी देश का प्रदर्शन असल में उस देश की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक उपलब्धियों का वास्तविक रिफ़्लेक्शन होता है. यूं ही नहीं है कि जिन देशों को हम सामाजिक-आर्थिक तरक्की करते देखते हैं, उन देशों के हिस्से ओलंपिक्स और दूसरी प्रतियोगिताओं में मेडल्स भी उसी अनुपात में बरसते हैं.


हम अब तक ओलंपिक में जितने भी पदक जीतते आये है वे खिलाड़ियों के व्यक्तिगत जुनून और संघर्ष का फल होता है. सरकार का बमुश्किल ही उसमें कोई योगदान होता है. सरकार तो तब सीन में आती है जब कोई खिलाड़ी अपने जुनून से पदक ले आता है, तब उस पर ईनाम बरसने लगता है. लेकिन जब वो संघर्ष कर रहा होता तब उसके अलावा कोई दूसरा उसके साथ नहीं होता है.


जब किसी कामयाब 'खिलाड़ी' के संघर्ष की कहानी का ज़िक्र प्रधानमंत्री से लेकर दूसरे नेता अपने भाषणों में बड़ी शान से लेकर आते हैं, तो असल में उन्हें इस पर गर्व नहीं बल्कि शर्म आनी चाहिए. उन्होंने इन खिलाड़ियों के लिए कोई ऐसा काम नहीं किया कि उन्हें अपने जीवन संघर्षों में कोई रियायत मिल पाए और वे अपने खेल पर पूरी तरह ध्यान दे पाएँ. अगर उन्होंने 'खेल' को प्राथमिकता दी होती तो किसी खिलाड़ी के मेडल के साथ भूख, गरीबी, कपड़े-जूते, कई किलोमीटरों के फासले का ज़िक्र नहीं होता.


ओलंपिक इस साल में भी खेलों के बजट में 230.78 करोड़ की कटौती की गई है, और हम उम्मीद कर रहे है कि हमारे पदकों की संख्या बढ़े?


शिवानी शोधार्थी हैं. राजनीति और सामाजिक कार्यकर्ता भी.


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