क्यों ना हो निशंक पर शंका?

निसंदेह निशंक आज अपने आप में बड़ी राजनैतिक ताकत हैं, उनसे अब प्रदेश ही नहीं देश को भी बड़ी उम्मीदें हैं. वह चाहते तो बात कतई इतनी आगे नहीं बढ़ती. कालेजों के अंदर की बात निकलकर आज चौराहों पर नहीं आती. मगर नहीं, वह तो सब कुछ जानते हुए भी कालेज संचालकों की ताकत बने हुए हैं.

- योगेश भट्ट



देश में नयी शिक्षा नीति को लेकर विमर्श का दौर चल रहा है. सरकार नयी नीति का मसौदा तैयार कर उस पर सुझाव मांग रही है. एक ओर इस मसौदे के तमाम प्राविधानों पर गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं तो केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखिरयाल ‘निशंक’ इसे बुनियादी बदलाव वाला बता रहे हैं. इसका जिक्र इन दिनों वह अपने तकरीबन हर संबोधन में कर रहे हैं. यह सही है कि शिक्षा नीति के मसौदे में बहुत कुछ अच्छा भी है, खासकर निजी संस्थानों की मनमानी पर नियंत्रण की बात काफी अहम है. मगर सवाल यह कि ‘निशंक’ की बातों पर यकीन कैसे किया जाए? शिक्षा नीति के मसौदे की धज्जियां तो खुद मानव संसाधन विकास मंत्री निशंक के अपने ‘घर’ में ही उड़ रही हैं.


जिस प्रदेश में वह मुख्यमंत्री रहे, जहां से वह सांसद हैं, वहां आयुर्वेदिक मेडिकल कालेजों के छात्र पढ़ाई के बजाय न्यायालय के चक्कर काटने और सड़कों पर धक्के खाने को मजबूर हैं. निजी कालेजों की मनमानी से तंग छात्र और अभिभावक सरकार से गुहार लगा रहे हैं, मगर देहरादून से दिल्ली तक उनकी कोई सुनवाई नहीं है. सैकड़ों छात्रों का भविष्य बर्बादी की कगार पर है फिर भी निजी आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज अराजक बने हुए हैं. इन कालेजों को न तो सरकार और विश्वविद्यालय का भय है और न ही न्यायालय की परवाह.


अराजकता का आलम यह है कि कालेजों के संचालक विश्वविद्यालय को तो ठेंगे पर रखे ही हुए हैं, उच्च न्यायालय नैनीताल के आदेश भी मानने को तैयार नहीं हैं. न्याय हक की बात करने वाले छात्रों और उनके अभिभावकों को खुलेआम धमकाया जा रहा है, छात्रों का भविष्य बर्बाद करने का भय दिखाया जा रहा है. आश्चर्य देखिए, जीरो टालरेंस और सुशासन की बात करने वाली डबल इंजन सरकार भी ‘मौन’ है और शिक्षा में बदलाव की बात करने वाले मंत्री भी.


कहते हैं न ‘बात निकलेगी तो दूर तक तो जाएगी’ यह किस्सा भी कुछ ऐसा ही है. सवाल दरअसल शिक्षा नीति का नहीं, सवाल नीति बनाने और उसे लागू कराने कराने वालों का है. जिस तरह राज्य के निजी आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज उत्तराखंड में खुलेआम ‘गुंडई’ पर उतरे हैं और सरकार मौन है, उसे देखकर तो कतई नहीं लगता कि छात्रों के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था की किसी को परवाह भी है. मनमानी देखिए कि राज्य के निजी आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज साढ़े चार साल के कोर्स में छात्रों से पांच साल की फीस लेते हैं, गैर कानूनी तरीके से शुल्क वृद्धि कराते हैं और उसे भी बैक डेट से लागू कर देते हैं.


हालत यह है कि अधिकांश संस्थानों में पढ़ाने के लिए न फैकल्टी पूरी है और न दूसरी जरूरी व्यवस्था. छात्र और अभिभावक न्याय की बात करते हैं तो उन्हें कहा जाता है कि ‘जहां जा सकते हो जाओ, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा’. हक की बात करने वाले छात्रों को चर्चित व्यापम घोटाले के हश्र का उदाहरण देकर डराया जाता है. राजनैतिक पकड़ की धौंस देते हुए भविष्य बिगाड़ने की धमकी दी जाती है.


दरअसल इन संस्थानों का मकसद शिक्षा नहीं सिर्फ व्यवसाय है, यह हकीकत किसी से छिपी नहीं है. बीस साल में प्रदेश में ऐसे निजी संस्थानों की संख्या सोलह तक पहुंच चुकी है. हाल ही में यह खबर भी आयी है कि प्रदेश के कई कालेजों को इस साल सीसीआईएम यानी सेंट्रल काउंसिल आफ इंडियन मेडिसिन ने मान्यता नहीं दी है. जिसमें प्रदेश के बड़े नेताओं से जुड़े कालेज भी शामिल हैं.


बहुत से लोगों को याद होगा कि राज्य बनने के कुछ समय पहले तक फर्जी माने जाने वाले आयुर्वेदिक कालेज मात्र दो दशक में उत्तराखंड में बड़ा साम्राज्य खड़ा कर चुके हैं. अब तो देखादेखी कई और कालेज खड़े हो गए. आयुर्वेदिक के साथ ही होम्योपैथ और यूनानी कालेज भी खुलने लगे हैं. कोई भी निजी कालेज मानकों पर नहीं है, सोसायटी या ट्रस्ट की आड़ में चल रहे ये कालेज सिर्फ व्यावसायिक अड्डे बने हुए हैं . जहां डाक्टरी की पढ़ाई के नाम अभिभावकों से मोटी वसूली तो होती है मगर न पढ़ाई है और न माहौल.


खैर! इन सब पर तथ्यों के साथ फिर कभी, अभी तो मसला यह है कि निजी आयुर्वेदिक कालेजों की मनमानी सीमाएं क्यों पार कर रही है. बीते दिनों न्याय की मांग कर रहे इन छात्रों पर पुलिस का कहर भी बरसा. कई छात्र गंभीर रूप से घायल हैं तो कई चोटिल हैं. आखिर क्या अपराध है उनका ? क्या यह कि वे निजी संस्थानों की मनमानी और अराजकता के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं ?


मसला यह है कि वर्ष 2015 में इन कालेजों की फीस अचानक 80 हजार रुपये से बढ़ाकर 2 लाख 15 हजार कर दी गयी थी. यह शुल्क वृद्धि पिछली तिथि से