तो क्या दुनिया के नक्शे से मिट जाएंगे एटॉल नेशन?

माना जाता है कि ग्लोबल वार्मिंग और क्लाईमेट क्राइसिस का सबसे पहला शिकार इसी प्रकार के देश होने वाले हैं. कुल 77 देश ऐसे हैं, जिनके सामने समुद्र की सतह में इजाफा होने के चलते डूबने का खतरा पैदा होता जा रहा है. इसमें भी कुछ ऐसे एटॉल नेशन हैं जिनके सामने खतरा बहुत भयंकर है.

- कबीर संजय

तस्वीर इंटरनेट से साभार

यूं तो पूरी दुनिया ही कुदरत का करिश्मा है। लेकिन, इसमें भी एटॉल नेशन किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं हैं। नीले समुंदरों पर वे किसी हरियाले नगीने की तरह जड़े होते हैं। पर सवाल यह है कि क्या ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट क्राइसिस इन हरियाले नगीनों की जान लेने वाला है।

प्रकृति में हैरान करने की असीम संभावनाएं हैं। एटॉल नेशन भी उन्हीं हैरानियों में से एक हैं। धरती की तरह ही समुद्र के अंदर बसे ज्वालामुखी भी फटते रहते हैं। इनका लावा मुहाने पर जमता रहता है। जिसके चलते वे लगातार ऊंचे होते जाते हैं। इन्हें सीमाउंट भी कहा जाता है। कई बार इनका लावा ऊपर आते-आते समुद्र की सतह के ऊपर भी पहुंच जाता है। पानी में होने के चलते यह लावा जल्द ही ठंडा हो जाता है। फिर कुछ खास किस्म के मूंगे यहां पर अपना निवास बना लेते हैं। मूंगे की चट्टानों से खास किस्म के द्वीपों का निर्माण होता है। जहां पर पक्षियों के जरिए पेड़-पौधों की तमाम किस्में पहुंच जाती हैं। जीव-जंतुओं की प्रजातियां निवास करने लगती हैं। इंसान भी रहने लगता है।

जाहिर है कि यह सब लाखों सालों के विकासक्रम में हुआ है। लेकिन, इन खूबसूरत चमत्कारों की मौत होने की संभावना बढ़ती जा रही है। समुद्री ज्वालामुखियों और मूंगे की चट्टानों से निर्मित ये द्वीप अपनी खूबसूरती के लिए जाने जाते हैं। लेकिन, आमतौर पर समुद्र तल से इनकी ऊंचाई बहुत ज्यादा नहीं होती। कुछ द्वीप तो ऐसे भी हैं जो समुद्र तल से मात्र दो-तीन मीटर तक ही ऊंचे हैं। जान लें कि धरती पर सबसे ऊंची जगह यानी माउंट एवरेस्ट समुद्र तल से आठ हजार आठ सौ अड़तालीस मीटर ऊंचा है।

माना जाता है कि ग्लोबल वार्मिंग और क्लाईमेट क्राइसिस का सबसे पहला शिकार इसी प्रकार के देश होने वाले हैं। कुल 77 देश ऐसे हैं, जिनके सामने समुद्र की सतह में इजाफा होने के चलते डूबने का खतरा पैदा होता जा रहा है। इसमें भी कुछ ऐसे एटॉल नेशन हैं जिनके सामने खतरा बहुत भयंकर है। ऐसे ही चार एटॉल नेशन यानी मालद्वीप, मार्शल द्वीप, कीरीबाती और तुवेलू जैसे देश डूबने से बचने के लिए हाथ पैर मार रहे हैं। इन चार देशों ने साझा कोशिशें शुरू कर दी हैं। समुद्र तल में इजाफा होगा तो डूबेंगे तो कई बड़े-बड़े शहर भी। लेकिन, एटॉल नेशन के सामने तो खतरा यह है कि उनका पूरा का पूरा देश ही डूब सकता है। क्योंकि, उनके पास जाने के लिए कोई ऊंची जगह नहीं है। फिर वे जाएंगे कहां। क्या उन्हें आस-पास के देशों द्वारा शरण दिया जाएगा। हालांकि, आज के जमाने में तो सैकड़ों सालों से बसे हुए लोगों को ही खदेड़ा और भगाया जा रहा है।

क्या वे कहीं पर अपने रहने के लिए जगहें खरीद लेंगे। पर कौन सा देश उन्हें अपनी जमीन बेचेगा, उन्हें रहने देगा, उन्हें अपना देश चलाने देगा। क्या ऐसे खरीदी गई किसी जमीन पर कोई देश कभी चल भी पाएगा।

जाहिर है कि इन सब सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है। चलिए, तब तक हम डोनाल्ड ट्रंप को धरती को कम गरम करने के अपने वायदे से पल्ला झाड़ते हुए देखते रहें। ब्राजील के बोलसोनारों को एमेजॉन के जंगलों को आग के हवाले करते देखते रहें। दुनिया के सबसे पुराने और अछूते जंगल हसदेव अरण्य को तहस-नहस करते, पूरी मुंबई के लिए सांस लेने वाले एरे फारेस्ट को कटते हुए देखते रहें।

हमारे वाले महापुरुष कुछ दिन पहले मालद्वीप गए थे। वहां पर उन्होंने मालद्वीप को क्रिकेट सिखाने का वायदा किया था। पता नहीं इस द्वीप को क्रिकेट की जरूरत क्यों है।

(लेख की कुछ बातें पर्यावरण पत्रिका डाउन टू अर्थ से ली गई हैं।)