क्या कोरोना का टीका सबको मिलेगा?

जब टीकों में से सर्वोत्तम टीके को वैज्ञानिक पहचान लें और उसे बनाने का निर्णय ले लिया जाए , जब टीका-निर्माण के लिए होने वाले विशाल धन-व्यय को कौन उठाएगा ?

- डॉ स्कन्द शुक्ल

"अगर कोरोनाविषाणु के खिलाफ़ टीका आ जाए , तो दुनिया में पर्याप्त रूप से उपलब्ध हो सकेगा?"

यह प्रश्न सुख्यात विज्ञान-जर्नल नेचर अपने सम्पादकीय में पूछता है। ज़ाहिर है जिनसे वह यह सवाल कर रहा है , वे उद्योगपति और राजनेता , दोनों हैं। टीकों की माँग के अनुसार समूचे विश्व में टीके न उपलब्ध करा पाना समस्या का एक हिस्सा है , टीकों की माँग के अनुसार समूचे विश्व में टीकों को उपलब्ध न होने देना दूसरा। व्यावहारिक तौर पर कोविड-19 के खिलाफ़ टीका बनने में एक-से-डेढ़ साल लगेंगे , यह ढेरों वैज्ञानिक कह रहे हैं। इतना समय लगता है। टीका भी एक दवा है , उसे आनन-फानन में जनता को देने में दूसरे ख़तरे हो सकते हैं। लेकिन जब टीकों में से सर्वोत्तम टीके को वैज्ञानिक पहचान लें और उसे बनाने का निर्णय ले लिया जाए , जब टीका-निर्माण के लिए होने वाले विशाल धन-व्यय को कौन उठाएगा ? ज़ाहिर है सरकारें और उद्योगपति। कई शोधकर्ताओं ने कहा है कि सरकारों व उद्योगपतियों को पहले से टीका-निर्माता-कम्पनियों के लिए प्रचुर धन की व्यवस्था करके रखनी चाहिए। हालांकि वायदे किये गये हैं , किन्तु जितना धन चाहिए उतना उपलब्ध हो सके , यह मुश्किल जान पड़ रहा है। कोरोनाविषाणु के खिलाफ़ टीके का उत्पादन करते समय अन्य बीमारियों के टीकों के उत्पादन को ठप्प तो कर नहीं सकते । उन्हें भी बनाते रहना पड़ेगा। फ़्लू , ख़सरा , मम्प्स , रूबेला जैसे रोगों के टीकों में लगने वाले धन को कोरोनाविषाणु के टीके के लिए नहीं खर्च किया जा सकता। ऐसे में विश्व-स्वास्थ्य-संगठन का कहना है कि वह टीके के समान वितरण के क्षेत्र में काम कर रहा है। पर कैसे ? संसाधनों और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों की समस्या से कैसे निबटा जाएगा ? कौन सा टीका बनाना तय हुआ , पहले यह तय किया जाएगा। टीका बनाने के लिए समूचे कोरोनाविषाणु को क्षीण या निष्क्रिय करके टीके के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है अथवा उसके कुछ प्रोटीनों या फिर आरएनए ( अथवा उससे निर्मित डीएनए ) को नैनोकण या ख़सरे-जैसे दूसरे विषाणु में डाल कर शरीर में प्रवेश कराया जा सकता है। इसके लिए विषाणु भी पर्याप्त मात्रा में चाहिए। ऐसे में अगर निष्क्रिय विषाणु से बनाया गया टीका सफल निकलता है , तब इसे बनाने में कितना धन लगेगा --- यह अपेक्षाकृत आसानी से जाना जा सकता है। सन् 1950 से अनेक रोगों के लिए निष्क्रिय कीटाणुओं से बनाये टीके हम इस्तेमाल करते रहे हैं। पर सार्स-सीओवी 2 जैसे विषाणु का बड़ी मात्रा में उत्पादन व शुद्धीकरण टेढ़ी खीर है , इसके लिए बीएसएल 3 स्तर की प्रयोगशालाएँ चाहिए। संसार-भर में ऐसी प्रयोगशालाएँ बहुत कम हैं और इसीलिए ढेरों टीका-निर्माता-कम्पनियाँ इस क़िस्म के टीका-निर्माण में रुचि नहीं ले रहीं। फिर दूसरा ढंग देखिए। विषाणु के आरएनए ( अथवा डीएनए ) को हमारे शरीर में भेजा जाए , और फिर हमारे शरीर की ही कोशिकाएँ सार्स-सीओवी 2 के प्रोटीन बनाएँ। यह अपेक्षाकृत आसान है और बड़े पैमाने पर करना सम्भव हो सकता है। पर ऐसा कोई टीका अब-तक मनुष्यों के लिए किसी रोग में उपलब्ध नहीं हो सका है। मॉडर्ना एवं क्योरवैक जैसी कम्पनियाँ इस प्रकार के टीका-निर्माण में लगी हुई हैं। तीसरा टीका-निर्माण का ढंग ख़सरे के टीके में इस तरह बदलाव लाने का है , ताकि वह टीका-विषाणु सार्स-सीओवी 2 के प्रोटीन भी शरीर के अन्दर बनाये। अगर यह कारगर निकला , तो ख़सरे का टीका बनाने वाली औद्योगिक सुविधाओं से सार्स-सीओवी 2 का टीका बनाने में मदद ली जाएगी। चौथी ढंग देखिए। टीका निर्माण में अगर सार्स-सीओवी 2 के अंशों का इस्तेमाल किया गया , तब एक और समस्या पैदा होगी। विषाणु-अंश से बनने वाले टीके सब-यूनिट वैक्सीन कहलाते हैं। इन्हें बनाते समय विषाणु के अंश को किसी दूसरे रासायनिक अणु ( जिसे एडजुवेंट कहा जाता है ) से जोड़ना पड़ता है। अब महामारी के दौरान इतनी बड़ी मात्रा में एडजुवेंट की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी ? एक और तरीक़ा पौधों में टीका को विकसित करने का है। तम्बाकू के पौधों का इसमें इस्तेमाल किया जा सकता है , क्योंकि वे तेज़ी से बढ़ते हैं। तम्बाकू-उत्पादक-कम्पनियाँ इस पर विचार कर रही हैं , किन्तु इस तरह के उत्पादन में आनुवंशिक रूप से परिवर्तित जीवों-सम्बन्धी समस्या आएगी। ( जीएम यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड कृषि पर दुनिया-भर में कितना वबाल चल रहा हैं , बताने की ज़रूरत नहीं। ) सरकारों व उद्योगपतियों को प्रचुर मात्रा में ढंग पहले से उपलब्ध कराना चाहिए ताकि सन् 2021 में टीका सभी को मिल सके। अनुमान है कि दो बिलयन डॉलर (कम-से-कम ) टीका-विकास और उनके ट्रायल में लगेंगे ; देशों ने छह सौ नब्बे मिलियन डॉलर का वादा किया है। फिर एक बिलियन डॉलर और खर्च होंगे ताकि टीके का निर्माण और वितरण किया जा सके। किन्तु बिलियनों डॉलर कम्पनियों को अभी से उत्पादन के लिए देने होंगे , ताकि उत्पादन के लिए यथासम्भव तैयारियाँ की जा सकें। एक और क़दम टीके की क़ीमत तय करने का है। जो देश इस क़ीमत का वहन नहीं कर सकते , उनके लिए भी टीकों की उपलब्धि सुनिश्चित करानी है। लेकिन ढेर सारे टीकों के बन जाने के बाद भी दुनिया-भर के देशों के बीच इसका बँटवारा ईमानदारी से कौन तय करेगा ? सन् 2009 में एच1एन1 का टीका सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने बनाया था , पर उसने तुरन्त इसे निर्यात नहीं किया। ( पहले अपने नागरिकों को इसे दिया। ) ज़्यादातर देशों के क़ानून टीका-निर्माताओं को स्थानीय बिक्री के लिए कहते हैं , बाहर निर्यात से रोकते हुए। विश्व-स्वास्थ्य-संगठन को आगे बढ़कर टीका-समूह के समान वितरण पर काम करना चाहिए। टीकों की जमाख़ोरी और कालाबाज़ारी इसके निर्माण के बावजूद उद्देश्य को पूरा नहीं होने देगी। यह सम्भव है जब तक टीका आये , संसार के ज़्यादातर लोग कोरोना-संक्रमित हो जाएँ। लेकिन फिर भी लोग अपनी प्रतिरक्षा को बेहतर ( बूस्ट ) करना चाहेंगे। टीका बनाने में जितनी समस्याएँ हैं , उससे कम टीका-उत्पादन व वितरण में नहीं हैं। ये समस्याएँ हमेशा रही हैं , हमेशा रहेंगी। ये मानव-वृत्ति की समस्याएँ हैं। कोविड-19 के चले जाने के बाद भी हमें इन समस्याओं से जूझते रहना है। #skandshukla22