भारत हिंदू राष्ट्र हो पाएगा?

भारत में दो भिन्न राष्ट्र हैं- मुस्लिम और हिंदू, और वे परस्पर संघर्षरत हैं- ऐसा सावरकर कहते भी थे। जिन्ना ने मुस्लिम राष्ट्र ले लिया, सावरकर हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं ले पाए? इसलिए नहीं कि गांधी और नेहरू ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया। बल्कि इसलिए कि जिन्ना की तरह सावरकर हिंदू राष्ट्र के लिए जनमत को एकमत नहीं कर सके। क्योंकि वो किस बिंदु पर हिंदुओं को एकमत करते?

- सुशोभित

भारतीय जनता पार्टी जब छोटी पार्टी थी, तब उसे यह सुभीता था कि वह अपने आचार-विचार में भेद ना रखे। तब वह नि:शंक होकर हिंदू-हित की बात करती थी। उसका मतदाता-वर्ग निश्चित था। हम तो बचपन से यही नारा सुनकर बड़े हुए- “जो हिंदू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा।” किंतु जब भारतीय जनता पार्टी आकार में तो बड़ी हो गई, पर उसी अनुपात में उसके चरित्र का विकास नहीं हो सका, तब उसके भीतर भेद आ गया। उसमें एक फांक आ गई। अब इस पार्टी का नेतृत्व तो “सबका साथ, सबका विश्वास” की बात करता है, किंतु उसका कैडर एक दूसरी ही भाषा बोलता है। यह पार्टी अपने अंतर्विरोधों और दोहरे चरित्र से ही ग्रस्त होकर पराभव की ओर अग्रसर हो जाएगी, इसको पृथक से विरोधियों की आवश्यकता नहीं है।


मैंने कल भी कहा था और आज फिर दोहराता हूं- भारतीय जनता पार्टी के नेता क्या कहते हैं, यह मत देखिए, उसके विपक्षी क्या कहते हैं, यह भी मत सुनिए, इस पार्टी के समर्थक क्या बोल रहे हैं, उस पर ध्यान दीजिए। पार्टी के इरादों और मनसूबों की ठीक-ठीक सूचना वहीं से बरामद होती है। इसलिए जब भारतीय जनता पार्टी कहती है कि हम पड़ोसी देशों के धार्मिक रूप से प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को अपने यहां शरण देना चाहते हैं तो इसे मत सुनिए। जब भारतीय जनता पार्टी का समर्थक प्रसन्नचित्त होकर कहता है कि पाकिस्तान के हिंदुओं को भारत शरण दे रहा है और मुसलमानों को आने से रोक रहा है, तो इस पर ध्यान दीजिए।


भाजपा समर्थक की यह स्पष्ट धारणा है कि उनकी पार्टी नागरिकता संशोधन विधेयक के माध्यम से टू-नेशन थ्योरी को क़ानूनी जामा पहना रही है। जो काम सन् सैंतालीस में अधूरा रह गया था, उसे पूरा करना है। केंद्रीय गृह मंत्री संसद में क्या दलीलें देते हैं, इसका महत्व नहीं है। उनके समर्थक उन दलीलों की कैसी व्याख्या करते हैं, उसी से आपको इस पार्टी के विचारों का सार मिलेगा।


मैं भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों से पूछना चाहूंगा कि भारत बड़ा या भारतीय जनता पार्टी बड़ी, यह निर्णय आपको करना चाहिए। दूसरे यह कि भारतीयता बड़ी या हिंदुत्व बड़ा, यह निर्णय भी आपको करना ही होगा। और तीसरे यह कि हिंदुत्व यानी क्या, यह निर्णय करने का समय भी अब आ गया है।


भाजपा समर्थक की मानें तो हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख के रूप में अभी पहली छलनी लगाई गई है, जिसमें से मुसलमान को बाहर किया गया है। समय आने पर कुछ और वर्गों को भी बाहर किया जाएगा। ईसाई को तो निश्चित ही। एक हिंदू राष्ट्र बनाया जाएगा। जो हिंदू हित की बात करेगा, वही देश में रहेगा। नागरिकता संशोधन विधेयक की यही व्याख्या भाजपा समर्थक इंटरनेट पर कर रहे हैं, और संसद में इस पार्टी का नेतृत्व एक दूसरी ही भाषा बोलने का छल कर रहा है।


पूछा जाना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीयता की यह कैसी परिभाषा है कि उसे पड़ोसी देश के अल्पसंख्यकों की चिंता है, किंतु अपने ही देश के पूर्वोत्तरवासी उसकी चिंता के दायरे में नहीं हैं? डिब्रूगढ़ जल रहा है, असम में मशालें उठा ली गई हैं, किंतु किसी भी भाजपा समर्थक की फ़ेसबुक वॉल पर इस सम्बंध में चिंता दिखलाई नहीं देती, पाकिस्तान से हिंदू यहां पर आएंगे, इसी का उत्सव दिखलाई देता है। यह भारतीय जनता पार्टी है या हिंदू जनता पार्टी है? पूर्वोत्तर में रहने वाला उनके हिंदू की परिभाषा में महत्व क्यों नहीं रखता है? क्या इसलिए कि वह उत्तर भारतीय सवर्ण हिंदू की परिभाषा के दायरे में नहीं है? वह मंगोलाइड है? अनार्य है? जनजातीय है? या फिर श्रीलंका का तमिल उनकी चिंता के दायरे में नहीं है, क्योंकि वह द्रविड़ है? पाकिस्तान का हिंदू ही उनकी चिंता के दायरे में है। अमित शाह भले ही उसे पाकिस्तान का अल्पसंख्यक कहें, उनकी पार्टी के समर्थक तो इसे पाकिस्तान का हिंदू की तरह ही सुन रहे हैं। पाकिस्तान का ईसाई की तरह वो इसको नहीं सुन रहे हैं। इसमें संशय नहीं होना चाहिए।


भारतीय राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्रवाद का द्वैत यहां पर आपके समक्ष उपस्थित हो जाता है। केंद्र में राज करने वाली पार्टी के समर्थक के लिए इनमें से कौन-सा राष्ट्रवाद मूल्यवान है, इसमें किसी को शुब्हा नहीं है। जिन लोगों को भारतीय राष्ट्रवाद के बजाय हिंदू राष्ट्रवाद को महत्व दिया जाना अखरता है, उन्हें मैं आगे बढ़कर यह समाचार और सुना दूं कि वास्तव में उनकी सर्वसम्मति अभी हिंदू राष्ट्रवाद पर भी नहीं है। वो किसको हिंदू समझते हैं, किसको हिंदू के रूप में मान्यता देते हैं, अभी इसका निर्णय करना भी शेष है।


कितने आश्चर्य की बात है कि केंद्रीय गृह मंत्री लोकसभा में खड़े होकर किसी भी अल्पशिक्षित फ़ेसबुकिये की तरह कह देते हैं कि भारत का विभाजन कांग्रेस ने कराया। फिर आपको आश्चर्य क्यों होना चाहिए कि इंटरनेट पर प्रवाहित होने वाली विष-गंगा का स्रोत क्या है, जब उद्‌गम का ही यह हाल है। कपिल सिब्बल ने राज्यसभा में उचित ही प्रश्न पूछा कि माननीय गृह मंत्री जी, कृपया आप बतलाइये कि आपने कौन-सा इतिहास पढ़ा है, और इतिहास की किस किताब से आप यह सूचना हमें दे रहे हैं, यह भी उद्‌धृत कीजिए। अमित शाह इसका उत्तर नहीं दे सकेंगे। वे सावरकर और गोलवलकर के अलावा किसी अन्य लेखक को उद्धृत नहीं कर सकेंगे। क्योंकि ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत-विभाजन को अंतिम समय तक टालने का उपक्रम कांग्रेस ने किया, यह तो मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा थी, जो टू-नेशन थ्योरी पर एकमत थे।


अाशीष नंदी ने ठीक ही कहा है कि जिन्ना और सावरकर एक ही विचार के दो रूप थे। जिन्ना इस्लामिक राष्ट्र चाहते थे, सावरकर हिंदू राष्ट्र चाहते थे। भारत में दो भिन्न राष्ट्र हैं- मुस्लिम और हिंदू, और वे परस्पर संघर्षरत हैं- ऐसा सावरकर कहते भी थे। जिन्ना ने मुस्लिम राष्ट्र ले लिया, सावरकर हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं ले पाए? इसलिए नहीं कि गांधी और नेहरू ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया। बल्कि इसलिए कि जिन्ना की तरह सावरकर हिंदू राष्ट्र के लिए जनमत को एकमत नहीं कर सके। क्योंकि वो किस बिंदु पर हिंदुओं को एकमत करते? हिंदू भला कब किसी बात पर एकमत हुए हैं? जिन्ना के लिए यह बड़ा आसान था। एक ईश्वर, एक अवतार, एक पुस्तक, एक नियमावली, एक जातिविहीन समुदाय- इसका राष्ट्र बनाना बड़ा आसान है। इस तरह के राष्ट्र में मानवाधिकार का मानमर्दन होता है, फिर यह भी उतना ही निश्चित है। हिंदुओं के पास न तो एक ईश्वर था, ना एक अवतार था, ना एक पुस्तक थी, ना एक दर्शन था, ना एक जाति-उपजाति थी, ना एक भाषा, प्रांत, संस्कृति थी। इसकी बहुलता ही इसका प्राण थी। इसीलिए यह सनातन परम्परा सर्वसमावेशी कहलाती थी और संसार कौतूहल से उसको देखता, उसका सम्मान करता था। हिंदू राष्ट्र की आकांक्षा उसको इकहरा बनाने की थी। किंतु यह सम्भव नहीं था। आज भी यह सम्भव नहीं हाे सकता है। ना अतीत में हुआ था, ना भविष्य में कभी हो सकेगा।


मैं फ़ेसबुक पर हिंदू राष्ट्रवादियों का एक हुजूम देखता हूं, किंतु इनमें से किसी के पास हिंदू राष्ट्र की रूपरेखा नहीं है। एक राष्ट्र-रूप में इस हिंदू राष्ट्र का न्यूनतम साझा कार्यक्रम क्या होगा, इस पर वे निश्चित नहीं है। किन राष्ट्रीय प्रतीकों पर ये एकमत होंगे? क्या अतीत से ऐसा कोई दृष्टांत वे प्रस्तुत कर सकते हैं कि किसी नरेश के साम्राज्य में पूरे भारत के हिंदू एकमत होकर राष्ट्र-रूप का निर्माण कर सके हों? गांधी जी के नेतृत्व में भारत अवश्य एकजुट हो गया था। भारतीय राष्ट्रवाद गांधी जी का स्वप्न भी था, आकांक्षा भी थी, और वह उनकी निर्मिति भी थी। इसके लिए वे जिन्ना के मुस्लिम-पूर्वग्रह, सावरकर के हिंदू-पूर्वग्रह और आम्बेडकर के दलित-पूर्वग्रह का प्रतिकार करते थे और उन्हें एक व्यापक धारा में लाने के लिए जुटे रहते थे। वे विफल रहे, किंतु उन्होंने पूरी कोशिश की, और एक बार भी, मन-वचन-कर्म से भारतीयता की धारा को खंडित नहीं होने दिया।


मैं देख रहा था कि एक हिंदू राष्ट्रवादी ने कहा, एनआरसी और सीएबी, ये कॉम्बो पैक की तरह हैं। ये एक साथ ही काम करेंगे। इनको मालूम नहीं कि जब आशीष नंदी सावरकर-प्रणीत हिंदू राष्ट्रवाद को यूरोपियन अवधारणा कहते हैं तो यह कॉम्बो पैक इसी बात की पुष्टि करता है। एथनोग्राफ़ी, स्टैटिस्टिक्स, सोशल डार्विनिज़्म, जनगणना- ये सब पश्चिमी पूर्वग्रह हैं। भारत में कभी इनका अस्तित्व नहीं रहा। नागरिक का सैन्यीकरण, उसका रेजीमेंटेशन, देश-रूप के बजाय राष्ट्र-रूप में उसका संविलयन, और एकरूप राष्ट्रीय प्रतीकों का निर्धारण- ये सब उन देशों के लिए ठीक है, जहां एक धर्म, एक जाति, एक नस्ल, एक भाषा है। यूरोप के बहुतेरे देश ऐसे ही हैं। यहूदी, इस्लामिक और ईसाई राष्ट्र भी इसके अनुरूप हैं। किंतु भारत तो एक सर्वथा भिन्न चेतना है। वह चेतना की एक अक्षुण्ण धारा है। भारत अतीत में कभी भी यूरोपियन अर्थों में राष्ट्र नहीं था, और आज भी वह एक यूनियन ऑफ़ स्टेट्स की तरह ही अस्तित्व में है, जिसमें राष्ट्रीय धारा का विकेंद्रीकरण होता है, एकीकरण नहीं होता।


इन सब बातों का ऊपर से भले ही नागरिकता संशोधन विधेयक से सीधा सरोकार नहीं मालूम होता हो, किंतु यह विधेयक जिस भावना का प्रसार भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों में कर रहा है, उसके संदर्भ में और उसकी विवेचना में ये बातें कहता हूं। ये अपना है और ये पराया है- कोई भी सरकार इस भाषा में नहीं सोचती है। वह धर्म के आधार पर किसी के अधिकारों में भेद नहीं करती है। वह अस्मिताओं का श्रेणीकरण नहीं करती है। वैसा चयन करने का अधिकार उसको नहीं है। देश के सभी लोगों का हित ही उसका प्राथमिक लक्ष्य होता है और शरणागत पर करुणा जतलाते समय वह दो नज़र नहीं रख सकती है। इस बात को सभी को स्मरण में रखना चाहिए।


भारत और हिंदू राष्ट्र- ये दो विपरीत धाराएं हैं। भारतवासियों को इनमें से किसी एक का चयन करना ही होगा। मैं तो अपना मत भारत को देता हूं। आप अपना मत चुन लीजिए।

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