'प्रकृति के ख़िलाफ़ 'आत्मघाती' युद्ध से बाज आए दुनिया'

''मानवता ने प्रकृति के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा हुआ है. यह मूर्खतापूर्ण और आत्मघाती क़दम है. हमारी लापरवाही के परिणाम, मानव जाति की पीड़ा, बढ़ते आर्थिक नुक़सान और दुनिया से जीवन के तेज़ी से हो रहे क्षरण में साफ़ तौर पर दिखाई देने लगे हैं.''

- Khidki Desk

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गुरूवार को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट प्रकाशित की गई है. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटरेस ने इसे, क्लाइमेट चेंज, प्रदूषण और कई पौंधों और पशु—पक्षियों की प्रजातियों पर छाए ख़तरे से निपटने के लिए एक नया साइंटिफ़िक ब्लूप्रिंट बताया है.


उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट प्रकृति के ख़िलाफ़ जारी आत्मघाती युद्ध के ख़ात्मे का एक रास्ता दिखलाती है. गुटरेस ने इस रिपोर्ट की भूमिका में लिखा है, ''मानवता ने प्रकृति के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा हुआ है. यह मूर्खतापूर्ण और आत्मघाती क़दम है. हमारी लापरवाही के परिणाम, मानव जाति की पीड़ा, बढ़ते आर्थिक नुक़सान और दुनिया से जीवन के तेज़ी से हो रहे क्षरण में साफ़ तौर पर दिखाई देने लगे हैं.''


गुटरेस ने यह भी कहा है कि क्लाइमेट इमरजेंसी, बायोडाय​वर्सिटी क्राइसिस और प्रदूषण के चलते हर साल लाखों लोगों को अपनी जान गवानी पड़ रही है और पृथ्वी बुरे हाल में है.


गुटरेस ने लिखा है यह रिपोर्ट एक पीस प्लान और पोस्ट वॉर रिबिल्डिंग प्रोग्राम के तहत हमें एक सुरक्षित रास्ता दिखलाती है. इस रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं.


रिपोर्ट में कहा गया है कि जीवाश्म ईंधन जैसे सैक्टर्स को 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर्स की सालाना सब्सिडी दी जानी चाहिए और औद्योगिक खेती, फिशिंग और माइनिंग को न्यूनतम कार्बन उत्सर्जन करने के लिए दिशा निर्देशित किया जाना चाहिए और प्रकृति को रिस्टोर होने का मौक़ा दिया जाना चाहिए.


रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारों को प्रदर्शन के अपने मापकों में महज़ आर्थिक विकास के पार जाकर, पारिस्थितिकी के संरक्षण में उनके योगदान के अनुसार भी आंकना चाहिए.


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