साधारण कहानी का असाधारण फ़िल्मॉंकन है 'यकुलॉंस'

एक बूढ़े व्यक्ति की नज़र से गॉंव और फिर अपने बेटे से मुलाक़ात के लिए उसके शहर आने की एक सामान्य कहानी को यहॉं जिस तरह से फ़िल्माया गया है वह आकर्षक है.

- रोहित जोशी


अपने पिछले विडियोज़ में रचनात्मकता और कला के रेशमी तारतम्य से ख़ुद-ब-ख़ुद दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बना चुके 'पाण्डवाज़' की 'टाइम मशीन' से आया चौथा प्रोडक्शन 'यकुलाँस' फिर ध्यान खींचता है.


उत्तराखंड की स्मृतियों और दर्द को अपनी कला में पिरोकर पान्डवाज़ यहॉं के लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाते आए हैं. यहॉं फिर वही कोशिश है.


एक बूढ़े व्यक्ति की नज़र से गॉंव और फिर अपने बेटे से मुलाक़ात के लिए उसके शहर आने की एक सामान्य कहानी को यहॉं जिस तरह से फ़िल्माया गया है वह आकर्षक है.


पलायन झेलते पहाड़ी गॉंव में एकाकी पड़ गया यह बूढ़ा व्यक्ति कहानी का मुख्य किरदार है. उसकी नज़र से उसके वीरानी भरे जीवन को दिखाने के लिए फ़िल्मॉंकन की जिस तक़नीक का इस्तेमाल किया गया है वह अपने आप में कहानी से ज़्यादा मज़बूत है.


फ़िल्म की कहानी को एक बार इस ​व्यक्ति के माथे में लगे कैमरे (संभवत: GoPro) से शूट किया गया है जो कि कहानी को इस व्यक्ति के पर्सपेक्टिव से स्टेब्लिश करती है. फिर इस नज़र से एक बार दिखा दी गई कहानी को ट्रेडिश्नल डिस्टेंस शूट के ​ज़रिए दोबारा दिखाया गया है. यह प्रक्रिया एक सामान्य कहानी को कहने का एक प्रभवशाली और नायाब प्रयोग बन पड़ी है.


फ़िल्म में एक गढ़वाली गीत का भी इस्तेमाल किया गया है जिसका फ़िल्मांकन पाण्डवाज़ के पिछले प्रोडक्शंस की तुलना में बेहद औसत है. (गढ़वाली भाषा का मेरा अज्ञान भी संभवत: मुझे उससे कनेक्ट ना कर पा रहा हो इसके लिए मैं माफ़ी चाहुॅंगा.)


ख़ैर उत्तराखंड में ​बन रहे सिनेमा में पाण्डवाज़ का नया हस्ताक्षर 'यकुलॉंस' यहॉं के सिनेमा को एक नई ऊँचाई तक समृद्ध करता दिखता है.


यहॉं आप पूरी फ़िल्म देख सकते हैं.